pina_AIA2RFAWACV3EAAAGAAFWDL7MB32NGQBAAAAAITRPPOY7UUAH2JDAY7B3SOAJVIBQYCPH6L2TONTSUO3YF3DHBLIZTASCHQA https://www.profitablecpmrate.com/gtfhp9z6u?key=af9a967ab51882fa8e8eec44994969ec Adhiyatmik Astro: || मकर सक्रांति पर्व ||

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Wednesday, January 14, 2026

|| मकर सक्रांति पर्व ||

|| मकर सक्रांति पर्व ||

|| मकर सक्रांति पर्व ||

        14-15 जनवरी 2026 

 

इस वर्ष मकर संक्रांति का पर्व 14 व 15 जनवरी 2026 के दिन मनाया जाएगा 


मकर संक्रांति सूर्य की उपासना का पर्व है। 

इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने पर खरमास की भी समाप्ति हो जाती है और सभी मांगलिक कार्य पुनः शुरू हो जाते हैं। 

पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होते हैं और ऐसे शुभ संयोग में मकर संक्रांति पर स्नान, दान, मंत्र जप और सूर्य उपासना से अन्य दिनों में किए गए दान-धर्म से अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है।


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आइए जानते हैं मकर संक्रांति का पुण्य और महापुण्य काल समय-: 


पुण्य काल‌ का समय-: 


* 14 जनवरी 2026, बुधवार, दोपहर 3:13 से अगले दिन 15 जनवरी को सुबह 08:00 बजे तक रहेगा। 

महापुण्य काल 14 जनवरी, दोपहर 3:13 से शाम 4:58 तक रहेगाl

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▪️षटतिला एकादशी व्रत (14 जनवरी)-: 

* यदि आप 14 जनवरी को पुण्य काल के दौरान किसी तरह का दान पुण्य करना चाहते हैं तो इस दिन तिल, फल एवं फलाहारी वस्तुओं से ही हो पाएगा, क्योंकि इस दिन षट्तिला एकादशी व्रत है अतः इस दिन किसी भी तरह का अनाज (अन्न) खाना व खिलाना वर्जित माना जाता है।


खिचड़ी का भोग व दान पुण्य 15 जनवरी-: 

* मकर संक्रांति पर खिचड़ी का सेवन और दान पुण्य करने की परंपरा काफी पुरानी है। यह स्वास्थ्य व संस्कृति से जुड़ी हुई परंपरा है। 14 जनवरी को षट्तिला एकादशी व्रत होने की वजह से इस दिन खिचड़ी का सेवन करना एवं दान- पुण्य करना बिल्कुल भी उचित नहीं होगा, अतः इसका दान- पुण्य व सेवन इत्यादि 15 जनवरी को करना उचित रहेगा।

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पुण्य काल का महत्व-: 

* मकर संक्रांति पर पुण्य का विशेष महत्व है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन से स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं. मकर संक्रांति के पुण्य काल में गंगा स्नान, सूर्योपासना, दान, मंत्र जप करने व्यक्ति के जन्मों के पाप धुल जाते है।


▪️स्नान-: 

* मकर सक्रांति वाले दिन सबसे पहले प्रातः किसी पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए, यदि यह संभव ना हो सके तो अपने नहाने के जल में थोड़ा गंगाजल डालकर स्नान किया जा सकता है।

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▪️सूर्योपासना-: 

* प्रातः स्नान के बाद उगते हुए सूर्य नारायण को तांबे के पात्र में जल, गुड, लाल पुष्प, गुलाब की पत्तियां, कुमकुम आदि मिलाकर जल अर्पित करना चाहिए।


▪️मंत्र जप-: 

* सूर्य उपासना के बाद में कुछ देर आसन पर बैठकर मंत्र, नाम जप, श्री गीता के पाठ इत्यादि करने चाहिए और अपने इष्ट देवी- देवताओं की भी उपासना करनी चाहिए।

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▪️गाय के लिए दान-: 

* पूजा उपासना से उठने के बाद गाय के लिए कुछ दान अवश्य निकालना चाहिए, जैसे- गुड, चारा इत्यादिl


▪️पितरों को भी करे याद-: 

* इस दिन अपने पूर्वजों को प्रणाम करना ना भूलें, उनके निमित्त भी कुछ दान अवश्य निकालें। इस दिन पितरों को तर्पण करना भी शुभ होता है। इससे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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▪️गरीब व जरूरतमंदों के लिए दान-: 

* इस दिन गरीब व जरूरतमंदों को जूते, चप्पल, (चप्पल- जूते चमड़े के नहीं होने चाहिए) अन्न, तिल, गुड़, चावल, मूंग, गेहूं, वस्त्र, कंबल, का दान करें। ऐसा करने से शनि और सूर्य देव की कृपा प्राप्त होती हैl


▪️खिचड़ी का दान 15 जनवरी को करें-: 

* खिचड़ी में चावल, दाल, घी और तिल जैसे तत्व होते हैं। 

ये केवल स्वादिष्ट ही नहीं होते बल्कि शरीर को ऊर्जा और पोषण भी देते हैं। 

धार्मिक मान्यता है कि यह सूर्य देव से जुड़ा भोजन है. इसे खाने या जरूरतमंदों को देने से स्वास्थ्य और मानसिक शांति मिलती है। 

मकर संक्रांति के दिन यह दान देने का विशेष महत्व है लेकिन इस बार 14 जनवरी को षट्तिला एकादशी का व्रत भी रहेगा अतः एकादशी तिथि पर चावल खाना एवं खिलाना दोनों ही  वर्जित होते हैं अतः यह दान 15 जनवरी को देना चाहिएl

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▪️परंपराओं का भी रखें ध्यान-:

* मकर सक्रांति का त्यौहार मनाने में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग- अलग परंपराएं हैं, अतः आप अपनी परंपराओं का भी ध्यान रखें। 

अर्थात अपने क्षेत्रीय रीति-रिवाजों के अनुसार मकर संक्रांति का त्यौहार मनाना चाहिएl


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मकरसंक्रांति पर्व :


ऋतु परिवर्तन का सूचक  ही नहीं सनातनके उत्कर्ष, खगोल,विज्ञान और लोक संस्कृति के मिलन का अनुपम संगम है मकर संक्रांति। 

वैदिक काल से ही इस पर्व की महत्ता है।


सूर्यआत्मा'जगत:तस्थुषश्च'

( चर - अचर की आत्मा ) कहा गया है। 

ऋग्वेद के अनुसार, सूर्य ऊर्जा और चेतना का स्रोत है। 

मकरसंक्रांति से 'उत्तरायण' का आरंभ होता है।

उपनिषदों ( विशेषकर छांदोग्य ) में उत्तरायण को 'देवयान' मार्ग कहा गया है। 

यह तमसोर्माज्योतिर्गमय व मृत्योर्मामृतंगमय का प्रतीकहै।

ज्योतिषीय दृष्टि से जब सूर्य धनु राशि को त्याग,पुत्र शनि की राशि 'मकर' में संक्रमण करते हैं, तो इसे मकर संक्रांति कहते हैं।

ज्योतिष में सूर्य 'आत्मा' है और शनि 'कर्म/अनुशासन'। 

पिता ( सूर्य ) का पुत्र ( शनि ) के घर जाना अहंकार त्याग और कर्तव्य के समन्वय का प्रतीक है। 

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मकर से दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी। 

यह इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान ( प्रकाश ) का प्रभाव अज्ञान ( अंधकार ) पर बढ़ने लगा है।

पुराणों में इस दिन को अत्यंत पवित्र माना गया है, जिससे कई दिव्य कथाएँ जुड़ी हैं:

महाभारत के अनुसार, इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त भीष्म ने उत्तरायण की प्रतीक्षा कर देह त्याग मोक्षप्राप्ति सुगम बनाई। 

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इसी दिनभागीरथी के कपिलाश्रम  होते हुए सागर में जा मिली थीं। 

इस लिए 'गंगासागर' स्नान का इस दिन विशेष महत्व है।

भगवानविष्णु ने इसी दिन असुर संहार, उनके सिर मंदार पर्वत पर दबा दिए, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

संतों ने मकर संक्रांति को केवल बाहरी कर्मकांड तक सीमित न रखकर इसे 'मन के रूपांतरण' से जोड़ा है।गोस्वामी तुलसीदास: रामचरितमानस में कहते हैं;

माघ मकरगत रवि जब होई। 

तीरथपतिहिं आवसब कोई॥ 

यहाँ 'तीर्थराज' का आसय प्रयाग में संतसंगति और अंतःकरण की शुद्धि से भी है।

मन के विकार भी शुद्ध करें,तभीत्रिवेणीजल में स्नान से मुक्ति संभव।वास्तविक संक्रांतिमें विचारों की 'समरसता' ( खिचड़ी की भांति )आए।खिचड़ी में अक्षत  ( चंद्र - शीतलता ),दाल ( मंगल - ऊर्जाघी ( सूर्य / तेज ),हल्दी ( गुरु / ज्ञान ) का मिश्रण होता है। 

संतों ने इसे सामाजिक समरसता और एकता का प्रतीक माना है।


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मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ के सेवन का गहरा दर्शन है। 

तिल सूक्ष्मता और तपस्या का प्रतीक है,जबकि गुड़ मिठास और प्रेम का। 

जैसे तिल रगड़ने पर तेल देता है और गुड़ आग में तपकर मिठास, वैसे ही मनुष्य को साधना की भट्ठी में तपकर अपने व्यक्तित्व में प्रेम और ज्ञान की मिठास लानी चाहिए।

मकर संक्रांति हमें जड़ता से चेतनता की ओर बढ़ने का आह्वान करती है। 

यह पर्व सिखाता है कि जीवन निरंतर गतिमान है ( संसरण ), और इस गति की दिशा 'प्रकाश' ( ज्ञान ) की ओर होनी चाहिए।

काशी कीगलियों से लेकर गंगातट तक, यह पर्व 'शिव' और 'शक्ति' के सामंजस्य का उत्सव है जहाँ जीव शिवत्व की ओर बढ़ता है।

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मकरसंक्रांति पर्व की सभी साधक सदस्य को अग्रिम शुभकामनाएं एवं बधाई📯🚩

मकर संक्रांति विशेष

हमारे पवित्र पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति का पर्व ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, आद्यशक्ति और सूर्य की आराधना एवं उपासना का पावन व्रत है, जो तन - मन - आत्मा को शक्ति प्रदान करता है। 

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संत-महर्षियों के अनुसार इसके प्रभाव से प्राणी की आत्मा शुद्ध होती है। 

संकल्प शक्ति बढ़ती है। 

ज्ञान तंतु विकसित होते हैं। 

मकर संक्रांति इसी चेतना को विकसित करने वाला पर्व है। 

यह संपूर्ण भारत वर्ष में किसी न किसी रूप में आयोजित होता है।


पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर एक महीने के लिए जाते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है। 

हालांकि ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य और शनि का तालमेल संभव नहीं, लेकिन इस दिन सूर्य खुद अपने पुत्र के घर जाते हैं। 

इस लिए पुराणों में यह दिन पिता - पुत्र के संबंधों में निकटता की शुरुआत के रूप में देखा जाता है।

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इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत करके युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। 

उन्होंने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इस लिए यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।


एक अन्य पुराण के अनुसार गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। 

उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। 

इस लिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है।

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विष्णु धर्मसूत्र में कहा गया है कि पितरों की आत्मा की शांति के लिए एवं स्व स्वास्थ्यवर्द्धन तथा सर्वकल्याण के लिए तिल के छः प्रयोग पुण्यदायक एवं फलदायक होते हैं- तिल जल से स्नान करना, तिल दान करना, तिल से बना भोजन, जल में तिल अर्पण, तिल से आहुति, तिल का उबटन लगाना।


सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से देवों की ब्रह्म मुहूर्त उपासना का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाता है। 

इस काल को ही परा - अपरा विद्या की प्राप्ति का काल कहा जाता है। 

इसे साधना का सिद्धिकाल भी कहा गया है। 

इस काल में देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण, यज्ञ कर्म आदि पुनीत कर्म किए जाते हैं। 

मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व से ही व्रत उपवास में रहकर योग्य को दान देना चाहिए।

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रामायण काल से भारतीय संस्कृति में दैनिक सूर्य पूजा का प्रचलन चला आ रहा है। 

राम कथा में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा नित्य सूर्य पूजा का उल्लेख मिलता है। 

रामचरित मानस में ही भगवान श्री राम द्वारा पतंग उड़ाए जाने का भी उल्लेख मिलता है। 

मकर संक्रांति का जिक्र वाल्मिकी रचित रामायण में मिलता है। 


राजा भगीरथ सूर्यवंशी थे, जिन्होंने भगीरथ तप साधना के परिणामस्वरूप पापनाशिनी गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पूर्वजों को मोक्ष प्रदान करवाया था। 

राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों का गंगाजल, अक्षत, तिल से श्राद्ध तर्पण किया था। 

तब से माघ मकर संक्रांति स्नान और मकर संक्रांति श्राद्ध तर्पण की प्रथा आज तक प्रचलित है। 

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कपिल मुनि के आश्रम पर जिस दिन मां गंगे का पदार्पण हुआ था, वह मकर संक्रांति का दिन था। 

पावन गंगा जल के स्पर्श मात्र से राजा भगीरथ के पूर्वजों को स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी। 

कपिल मुनि ने वरदान देते हुए कहा था, 'मातु गंगे त्रिकाल तक जन - जन का पापहरण करेंगी और भक्तजनों की सात पीढ़ियों को मुक्ति एवं मोक्ष प्रदान करेंगी। 

गंगा जल का स्पर्श, पान, स्नान और दर्शन सभी पुण्यदायक फल प्रदान करेगा।' 


महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था। 

उनका श्राद्ध संस्कार भी सूर्य की उत्तरायण गति में हुआ था। 

फलतः आज तक पितरों की प्रसन्नता के लिए तिल अर्घ्य एवं जल तर्पण की प्रथा मकर संक्रांति के अवसर पर प्रचलित है।


सूर्य की सातवीं किरण भारत वर्ष में आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देने वाली है। 

सातवीं किरण का प्रभाव भारत वर्ष में गंगा - जमुना के मध्य अधिक समय तक रहता है। 

इस भौगोलिक स्थिति के कारण ही हरिद्वार और प्रयाग में माघ मेला अर्थात मकर संक्रांति या पूर्ण कुंभ तथा अर्द्धकुंभ के विशेष उत्सव का आयोजन होता है।


जैसे कि पितृ तुल्य भगवान भास्कर दक्षिणायन से उत्तरायण में जा रहे हैं

ऊर्जामयी रश्मियाँ अपना प्रवास बढ़ाने वाली हैं 

अतुल्य शक्ति स्त्रोत प्रकृति अंधेरी रातें छोटी कर

दिन का उजाला बढ़ाने वाली है

धरती माता उदरस्त अनाज को पकाने वाली है 

मल्टी विटामिन से भरपूर "तिल" "गुड़" के साथ मिलकर रक्त का भी शोधन करने वाला है

जब सब कुछ ही अच्छा होने वाला है

तो क्यों न मनोभावों की निराशा का संक्रमण कर सकारात्मकता और व्यवहार में नवीन ऊर्जा का संचार कर जीवन में मंगल बढ़ाया जाए और सही अर्थों में संक्रांति उत्सव मनाया जाए..


☄सभी को मकर संक्रान्ति की हार्दिक मंगलकामनाये☄

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पौ‍राणिक घटनाएं जो मकरसंक्रांति को बनाती है खास


गंगा जी मिली थी गंगा सागर में  मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथजी के पीछे - पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। 

महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था इस लिए मकर संक्रांति पर गंगासागर में मेला लगता है। 

राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों का गंगाजल, अक्षत, तिल से श्राद्ध तर्पण किया था। 

तब से ही माघ मकर संक्रांति स्नान और मकर संक्रांति श्राद्ध तर्पण की प्रथा आज तक प्रचलित है। 

पावन गंगा जल के स्पर्श मात्र से राजा भगीरथ के पूर्वजों को स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी। 

कपिल मुनि ने वरदान देते हुए कहा था, 'मातु गंगे त्रिकाल तक जन - जन का पापहरण करेंगी और भक्तजनों की सात पीढ़ियों को मुक्ति एवं मोक्ष प्रदान करेंगी। 

गंगा जल का स्पर्श, पान, स्नान और दर्शन सभी पुण्यदायक फल प्रदान करेगा।'


एक कथा के अनुसार एक बार राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ किया और अपने अश्व को विश्व - विजय के लिए छोड़ दिया। 

इंद्रदेव ने उस अश्व को छल से कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। 

जब कपिल मुनि के आश्रम में राजा सगर के 60 हजार पुत्र युद्ध के लिए पहुंचे तो कपिल मुनि ने श्राप देकर उन सब को भस्म कर दिया। 

राजकुमार अंशुमान, राजा सगर के पोते ने कपिल मुनि के आश्रम में जाकर विनती की और अपने बंधुओं के उद्धार का रास्ता पूछा। 

तब कपिल मुनि ने बाताया कि इनके उद्धार के लिये गंगाजी को धरती पर लाना होगा। 

तब राजा अंशुमन ने तप किया और अपनी आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश दिया। 

बाद में अंशुमान के पुत्र दिलीप के यहां भागीरथ का जन्म हुआ और उन्होंने अपने पूर्वज की इच्छा पूर्ण की।


श्रीहरि विष्णु ने किया था असुरों का वध इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत करके युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। 

उन्होंने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। 

इस लिए यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।

 

सूर्यवंशी राजा करते हैं सूर्य की पूजा रामायण काल से ही भारतीय संस्कृति में दैनिक सूर्य पूजा का प्रचलन चला आ रहा है। 

रामकथा में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा नित्य सूर्य पूजा का उल्लेख मिलता है। 

मकर संक्रांति के दिन सूर्य की विशेष आराधना होती है।


सूर्य की सातवीं किरण सूर्य की सातवीं किरण भारतवर्ष में आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देने वाली है। 

सातवीं किरण का प्रभाव भारत वर्ष में गंगा-जमुना के मध्य अधिक समय तक रहता है। 

इस भौगोलिक स्थिति के कारण ही हरिद्वार और प्रयाग में माघ मेला अर्थात मकर संक्रांति या पूर्ण कुंभ तथा अर्द्धकुंभ के विशेष उत्सव का आयोजन होता है।

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भीष्म पितामह  महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने का ही इंतजार किया था। 

कारण कि उत्तरायण में देह छोड़ने वाली आत्माएं या तो कुछ काल के लिए देवलोक में चली जाती हैं या पुनर्जन्म के चक्र से उन्हें छुटकारा मिल जाता है। 

उनका श्राद्ध संस्कार भी सूर्य की उत्तरायण गति में हुआ था। 

फलतः आज तक पितरों की प्रसन्नता के लिए तिल अर्घ्य एवं जल तर्पण की प्रथा मकर संक्रांति के अवसर पर प्रचलित है।

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सूर्य जाते हैं अपने पुत्र शनि के घर हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार इसी दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर एक महीने के लिए जाते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है। 

कथा के अनुसार सूर्यदेव ने शनि और उनकी माता छाया को खुद से अलग कर दिया था, जिसके कारण शनि के प्रकोप के चलते उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। 

तब सूर्यदेव के दूसरे बेटे यमराज ने इ रोग को ठीक किया था। 

रोगमुक्त होने के बाद सूर्यदेव ने क्रोध में आकर उनके घर कुंभ को जला दिया था। 

परंतु बाद में यमराज के समझाने पर वे जब शनि के घर गए तो उन्होंने वहां देखा कि सबकुछ जल चुका था केवल काला तिल वैसे का वैसा रखा था। 

अपने पिता को देखकर शनिदेव ने उनका स्वागत उसी काले तिल से किया। 

इस से प्रसन्न होकर सूर्य ने उन्हें दूसरा घर ‘मकर’ उपहार में दे दिया। 

इस के बाद सूर्यदेव ने शनि को कहा कि जब वे उनके नए घर मकर में आएंगे, तो उनका घर फिर से धन और धान्य से भर जाएगा। 

साथ ही कहा कि मकर संक्रांति के दिन जो भी काले तिल और गुड़ से मेरी पूजा करेगा उसके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।


यशोदाजी ने किया था व्रत  कहते हैं कि माता यशोदा जी ने श्रीकृष्‍णजी के लिए व्रत किया था तब सूर्य उत्तरायण हो रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति थी। 

तभी से मकर संक्रांति के व्रत का प्रचलन प्रारंभ हुआ।


उत्तरायण होता है सूर्य तब देवताओं का दिन प्रारंभ होता है।

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मकर संक्रांति के दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण गति करने लगते हैं। 

इस दिन से देवताओं का छह माह का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। 

सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से देवों की ब्रह्म मुहूर्त उपासना का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाता है। 

इस काल को ही परा - अपरा विद्या की प्राप्ति का काल कहा जाता है। 

इसे साधना का सिद्धिकाल भी कहा गया है। 

इस काल में देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण, यज्ञ कर्म आदि पुनीत कर्म किए जाते हैं। 

मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व से ही व्रत उपवास में रहकर योग्य पात्रों को दान देना चाहिए।


सूर्य संस्कृति में मकर संक्रांति का पर्व ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, आद्यशक्ति और सूर्य की आराधना एवं उपासना का पावन व्रत है, जो तन - मन - आत्मा को शक्ति प्रदान करता है।* 

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संत - महर्षियों के अनुसार इसके प्रभाव से प्राणी की आत्मा शुद्ध होती है। 

संकल्प शक्ति बढ़ती है। 

ज्ञान तंतु विकसित होते हैं। 

मकर संक्रांति इसी चेतना को विकसित करने वाला पर्व है।

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विष्णु धर्मसूत्र में कहा गया है कि पितरों की आत्मा की शांति के लिए एवं स्व स्वास्थ्यवर्द्धन तथा सर्वकल्याण के लिए तिल के छः प्रयोग पुण्यदायक एवं फलदायक होते हैं- तिल जल से स्नान करना, तिल दान करना, तिल से बना भोजन, जल में तिल अर्पण, तिल से आहुति, तिल का उबटन लगाना।*,,

🌹🌹 हर हर महादेव 🌹🌹

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