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Thursday, January 15, 2026

स्वस्तिवाचन मन्त्र ( अर्थ सहित ) :

स्वस्तिवाचन मन्त्र ( अर्थ सहित ) / प्रसिद्ध आरती ओम्_जय_जगदीश_हरे के रचयिता कौन हैं ? / आज गंगा सागर यात्रा विशेष : 

स्वस्तिवाचन मन्त्र ( अर्थ सहित ) :


हमारे देश की यह प्राचीन परंपरा रही है कि जब कभी भी हम कोई कार्य प्रारंभ करते है, तो उस समय मंगल की कामना करते है और सबसे पहले मंगल मूर्ति गणेश की प्रार्थना करते है। 


इस के लिए दो नाम हमारे सामने आते हैं... पहला श्रीगणेश और दूसरा जय गणेश।



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श्रीगणेश का अर्थ होता है कि जब हम किसी कार्य को आरंभ करते है, तो इसी नाम के साथ उस कार्य की शुरुआत करते है। 

जय गणेश का अर्थ होता है कि अब यह कार्य यहां समाप्त हो रहा है।

प्राचीनकाल से ही वैदिक मंत्रों में जितनी ऋचाएं आई है, उनके चिन्तन, वाचन से अलौकिक दिव्य शक्ति की प्राप्ति होती है, मन शान्त होता है। 
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किसी भी शुभ कार्य के प्रारम्भ में, विवाह मण्डप पर, शगुन और तिलक में भी इसकी प्रथा है, या फिर जब कभी भी हम कोई मांगलिक कार्य करते है तो स्वस्तिवाचन की परंपरा रही है। 

यह एक गहन विज्ञान है, जिसे समझने की आवश्यकता है।

यदि हम केवल मंगल वचन का प्रयोग करे और मांगलिक शब्दों का प्रयोग उसके अर्थ को बिना जाने हुए करे तो निश्चय ही यह हमारा अंधविश्वास माना जाएगा। 

जब तक धर्म को तथा उसके विज्ञान को हम समझ न लें, तब तक केवल अंधविश्वासी होकर उसकी सभी बातों को मानने का कोई औचित्य नहीं है। 

हमारा धर्म, हमारी संस्कृति,वैदिक ऋचाएं, वैदिक मंत्र, पुराण उपनिषद आदि इन सभी ग्रन्थों पृष्टभूमि में विज्ञान निहित है। 

हमारे ऋषियों ने जिन वैदिक ऋचाओं और पुराणों की कल्पना की, उपनिषदों के बारे में सोचा था फिर मांगलिक कार्यो के लिए जैसी व्यवस्था की, वह हमारे विज्ञान से किसी भी तरह से अलग नहीं है। 
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उनके द्वारा सोची और की जाने वाली हर एक पहल हमेशा से ही विज्ञान के साथ रही है। 

मन्त्र-1 आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।
देवा नोयथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥ 

अर्थ  हमारे पास चारों ओर से ऐंसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। 

प्रगति को न रोकने वाले और सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिए तत्पर रहें।

मन्त्र-2 देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम्।
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥ 

अर्थ  यजमान की इच्छा रखने वाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु को जीने के निमित्त बढ़ायें।
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मन्त्र-3 तान् पूर्वयानिविदाहूमहे वयंभगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्।
अर्यमणंवरुणंसोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्।।

अर्थ  हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा और अश्विनीकुमारों का आवाहन करते हैं। 

ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करें।

मन्त्र-4 तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत् पिता द्यौः ।
तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥ 

अर्थ  वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। 

माता पृथ्वी और पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। 

सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। 

हे अश्विनी - कुमारो! आप दोनों सबके आधार हैं, हमारी प्रार्थना सुनिये।
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मन्त्र-5 तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम् ।
पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥

अर्थ  हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष देनेवाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। 

वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि और कल्याण के निमित्त हों।

मन्त्र-6  स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पुषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

अर्थ  महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, सबके पोषणकर्ता वे पूषा ( सूर्य ) हमारा कल्याण करें। 

जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। 

वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।
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मन्त्र-7  पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः ।
अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ॥ 

अर्थ  चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सबका कल्याण करने वाले, यज्ञशालाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण और विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में आयें।

मन्त्र-8  भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥

अर्थ  हे यजमान के रक्षक देवताओं! हम दृढ अङ्गों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए कानों से कल्याण की बातें सुनें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें।
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मन्त्र-9  शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम ।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः॥

अर्थ  हे देवताओं! आप सौ वर्ष की आयु - पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र, पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जाएँ, हमारी उस गमनशील आयु को आपलोग बीच में खण्डित न होने दें।

मन्त्र-10 अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।
विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम॥

अर्थ  अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष - रुप है, वही पराशक्ति माता - पिता और पुत्र भी है। 
समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है और जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।
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मन्त्र-11 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थ  द्युलोक शान्तिदायक हों, अन्तरिक्ष लोक शान्तिदायक हों, पृथ्वीलोक शान्तिदायक हों। 

जल, औषधियाँ और वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। 

सभी देवता, सृष्टि की सभी शक्तियाँ शान्तिदायक हों। 

ब्रह्म अर्थात महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों। 
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उनका दिया हुआ ज्ञान, वेद शान्ति देने वाले हों। 

सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हों अर्थात सब जगह शान्ति ही शान्ति हो। 

ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो और वह सदा बढ़ती ही रहे। 

अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण - कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। 

समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो।

।। जय श्री हरि ।।

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प्रसिद्ध आरती ओम्_जय_जगदीश_हरे के रचयिता कौन हैं ? 

ओम् जय जगदीश हरे, आरती आज हर हिन्दू घर में गाई जाती है. इस आरती की तर्ज पर अन्य देवी देवताओं की आरतियाँ बन चुकी है और गाई जाती है, परंतु इस मूल आरती के रचयिता के बारे में काफी कम लोगों को पता है. इस आरती के रचयिता थे पं. श्रद्धाराम_शर्मा या श्रद्धाराम_फिल्लौरी. पं. श्रद्धाराम शर्मा का जन्म पंजाब के जिले जालंधर में स्थित फिल्लौर शहर में हुआ था वे सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संगीतज्ञ तथा हिन्दी और पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे. उनका विवाह सिख महिला महताब कौर के साथ हुआ था.बचपन से ही उन्हें ज्यौतिष और साहित्य के विषय में गहरी रूचि थी.

उन्होनें वैसे तो किसी प्रकार की शिक्षा हासिल नहीं की थी परंतु उन्होंने सात साल की उम्र तक गुरुमुखी में पढाई की और दस साल की उम्र तक वे संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी भाषाओं तथा ज्योतिष की विधा में पारंगत हो चुके थे.
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उन्होने पंजाबी ( गुरूमुखी ) में ‘सिक्खां दे राज दी विथियाँ’ और ‘पंजाबी बातचीत’ जैसी पुस्तकें लिखीं. ‘सिक्खां दे राज दी विथियाँ’ उनकी पहली किताब थी. इस किताब में उन्होनें सिख धर्म की स्थापना और इसकी नीतियों के बारे में बहुत सारगर्भित रूप से बताया था. यह पुस्तक लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय साबित हुई थी और अंग्रेज सरकार ने तब होने वाली आईसीएस ( जिसका भारतीय नाम अब आईएएस हो गया है ) परीक्षा के कोर्स में इस पुस्तक को शामिल किया था. पं. श्रद्धाराम शर्मा गुरूमुखी और पंजाबी के अच्छे जानकार थे और उन्होनें अपनी पहली पुस्तक गुरूमुखी मे ही लिखी थी परंतु वे मानते थे कि हिन्दी के माध्यम से ही अपनी बात को अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाया जा सकता है. 


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हिन्दी के जाने माने लेखक और साहित्यकार पं. रामचंद्र शुक्ल ने पं. श्रद्धाराम शर्मा और भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिन्दी के पहले दो लेखकों में माना है.

उन्होनें 1877 में भाग्यवती नामक एक उपन्यास लिखा था जो हिन्दी में था. माना जाता है कि यह हिन्दी का पहला उपन्यास है. इस उपन्यास का प्रकाशन 1888 में हुआ था. 

इसके प्रकाशन से पहले ही पं. श्रद्धाराम का निधन हो गया परंतु उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने काफी कष्ट सहन करके भी इस उपन्यास का प्रकाशन करावाया था वैसे पं. श्रद्धाराम शर्मा धार्मिक कथाओं और आख्यानों के लिए काफी प्रसिद्ध थे. वे महाभारत का उध्दरण देते हुए अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जनजागरण का ऐसा वातावरण तैयार कर देते थे उनका आख्यान सुनकर प्रत्यैक व्यक्ति के भीतर देशभक्ति की भावना भर जाती.

इस से अंग्रेज सरकार की नींद उड़ने लगी और उसने 1865 में पं. श्रद्धाराम को फुल्लौरी से निष्कासित कर दिया और आसपास के गाँवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी.लेकिन उनके द्वारा लिखी गई किताबों का पठन विद्यालयों में हो रहा था और वह जारी रहा.निष्कासन का उन पर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि उनकी लोकप्रियता और बढ गई.निष्कासन के दौरान उन्होनें कई पुस्तकें लिखी और लोगों के सम्पर्क में रहे. पं. श्रद्धाराम ने अपने व्याख्यानों से लोगों में अंग्रेज सरकार के खिलाफ क्रांति की मशाल ही नहीं जलाई बल्कि साक्षरता के लिए भी ज़बर्दस्त काम किया. 1870 में उन्होने एक ऐसी आरती लिखी जो भविष्य में घर घर में गाई जानी थी.
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वह आरती थी – ऑम जय जगदीश हरे…पं. शर्मा जहाँ कहीं व्याख्यान देने जाते ओम जय जगदीश आरती गाकर सुनाते.

उनकी यह आरती लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगी और फिर तो आज कई पीढियाँ गुजर जाने के बाद भी यह आरती गाई जाती रही है और कालजई हो गई है.

इस आरती का उपयोग प्रसिद्ध निर्माता निर्देशक मनोज कुमार ने अपनी एक फिल्म में किया था और इस लिए कई लोग इस आरती के साथ मनोज कुमार का नाम जोड़ देते हैं.
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पं. शर्मा सदैव प्रचार और आत्म प्रशंसा से दूर रहे थे. शायद यह भी एक वजह हो कि उनकी रचनाओं को चाव से पढने वाले लोग भी उनके जीवन और उनके कार्यों से परिचित नहीं हैं. 24 जून 1881 को लाहौर में पं. श्रद्धाराम शर्मा ने आखिरी सांस ली ।

आज गंगा सागर यात्रा विशेष :

सारे तीरथ बार - बार गंगा सागर एक बार जाने क्यों

गंगा सागर को तीर्थों का पिता कहा जाता है, कहने का तात्पर्य है कि गंगा सागर का अन्य तीर्थों की अपेक्षा अत्यधिक महत्व है। 

शायद यही कारण है कि जन साधारण में यह कहावत बहुत प्रचलित है कि- ''सब तीरथ बार - बार, गंगा सागर एक बार।'

' गंगा जिस स्थान पर समुद्र में मिलती है, उसे गंगा सागर कहा गया है। 

गंगा सागर एक बहुत सुंदर वन द्वीप समूह है जो बंगाल की दक्षिण सीमा में बंगाल की खाड़ी पर स्थित है। 
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प्राचीन समय में इसे पाताल लोक के नाम से भी जाना जाता था। 

कलकत्ते से यात्री प्रायः जहाज में गंगा सागर जाते हैं। 

यहां मेले के दिनों में काफी भीड़ - भाड़ व रौनक रहती है। 

लेकिन बाकी दिनों में शांति एवं एकाकीपन छाया रहता है। 

तीर्थ स्थान - सागर द्वीप में केवल थोड़े से साधु ही रहते हैं। 

यह अब वन से ढका और प्रायः जनहीन है। 

इस सागर द्वीप में जहां गंगा सागर मेला होता है, वहां से एक मील उत्तर में वामनखल स्थान पर एक प्राचीन मंदिर है।

इस समय जहां गंगा सागर पर मेला लगता है, पहले यहीं गंगाजी समुद्र में मिलती थी, किंतु अब गंगा का मुहाना पीछे हट गया है। 
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अब गंगा सागर के पास गंगाजी की एक छोटी धारा समुद्र से मिलती है। 

आज यहां सपाट मैदान है और जहां तक नजर जाती है वहां केवल घना जंगल। 

मेले के दिनों में गंगा के किनारे पर मेले के लिए स्थान बनाने के लिए इन जंगलों को कई मीलों तक काट दिया जाता है। 

गंगा सागर का मेला मकर संक्रांति को लगता है। 

खाने - पीने के लिए होटल, पूजा - पाठ की सामग्री व अन्य सामानों की भी बहुत - सी दुकानें खुल जाती हैं। 

सारे तीर्थों का फल अकेले गंगा सागर में मिल जाता है। 

संक्रांति के दिन गंगा सागर में स्नान का महात्म्य सबसे बड़ा माना गया है। 

प्रातः और दोपहर स्नान और मुण्डन - कर्म होता है। 

यहां पर लोग श्राद्ध व पिण्डदान भी करते हैं।
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कपिल मुनि के मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं, इसके बाद लोग लौटते हैं ओर पांचवें दिन मेला समाप्त हो जाता है। 

गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसमें बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। 

उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है। 

इसके अलावा यहां सांखय योग के आचार्य कपिलानंद जी का आश्रम, महादेव मंदिर, योगेंद्र मठ, शिव शक्ति - महानिर्वाण आश्रम और भारत सेवाश्रम संघ का विशाल मंदिर भी हैं।

रामायण में एक कथा मिलती है जिसके अनुसार कपिल मुनि किसी अन्य स्थान पर तपस्या कर रहे थे। 
ऐसे ही समय में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सगर एक अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने लगे। 

उनके अश्वमेध यज्ञ से डरकर इंद्र ने राक्षस रूप धारण कर यज्ञ के अश्व को चुरा लिया और पाताल लोक में ले जाकर कपिल के आश्रम में बांध दिया। 
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राजा सगर की दो पत्नियां थीं- केशिनी और सुमति। 

केशिनी के गर्भ से असमंजस पैदा हुआ और सुमति के गर्भ से साठ हजार पुत्र। 

असमंजस बड़ा ही उद्धत प्रकृति का था। 

वह प्रजा को बहुत पीड़ा देता था। अतः सगर ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया था। 

अश्वमेध का घोड़ा चुरा लिये जाने के कारण सगर बड़ी चिंता में पड़ गये। 

उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को अश्व ढूंढने के लिए कहा। 

साठों हजार पुत्र अश्व ढूंढते ढूंढते - ढूंढते पाताल लोक में पहुंच गये। 

वहां उन लोगों ने कपिल मुनि के आश्रम में यज्ञीय अश्व को बंधा देखा। 

उन लोगों ने मुनि कपिल को ही चोर समझकर उनका काफी अपमान कर दिया। 

अपमानित होकर ऋषि कपिल ने सभी को शाप दिया- 'तुम लोग भस्म हो जाओ।
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' शाप मिलते ही सभी भस्म हो गये। पुत्रों के आने में विलंब देखकर राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान, जो असमंजस का पुत्र था, को पता लगाने के लिए भेजा। 

अंशुमान खोजते - खोजते पाताल लोक पहुंचा। 

वहां अपने सभी चाचाओं को भस्म रूप में परिणत देखा तो सारी स्स्थिति समझ गया। 

उन्होंने कपिल मुनि की स्तुति कर प्रसन्न किया। 

कपिल मुनि ने उसे घोड़ा ले जाने की अनुमति दे दी और यह भी कहा कि यदि राजा सगर का कोई वंशज गंगा को वहां तक ले आये तो सभी का उद्धार हो जाएगा। 

अंशुमान घोड़ा लेकर अयोध्या लौट आया। 

यज्ञ समाप्त करने के बाद राजा सगर ने 30 हजार वर्षों तक राज्य किया और अंत में अंशुमान को राजगद्दी देकर स्वर्ग सिधार गये। 

अंशुमान ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का काफी प्रयत्न किया, लेकिन सफल नहीं हो पाया। 

अंशुमान के पुत्र दिलीप ने दीर्घकाल तक तपस्या की। 

लेकिन वह भी सफल नहीं हो पाया। 

दिलीप के पुत्र भगीरथ ने घोर तपस्या की। 
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गंगा ने आश्वासन दिया कि मैं जरूर पृथ्वी पर आऊंगी, लेकिन जिस समय मैं स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आऊंगी, उस समय मेरे प्रवाह को रोकने के लिए कोई उपस्थित होना चाहिए। 

भगीरथ ने इसके लिए भगवान शिव को प्रसन्न किया। 

भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटा में धारण कर लिया। 

भगीरथ ने उन्हें पुनः प्रसन्न किया तो शिवजी ने गंगा को छोड़ दिया।

गंगा शिवजी के मस्तक से सात स्रोतों में भूमि पर उतरी। 

ह्रानिदी, पावनी और नलिनी नामक तीन प्रवाह पूर्व की ओर चल गये, वड.क्ष, सीता तथा सिंधु नामक तीन प्रवाह पश्चिम की ओर चले गये और अंतिम एक प्रवाह भगीरथ के बताए हुए मार्ग से चलने लगा। 

भगीरथ पैदल गंगा के साथ नहीं चल सकते थे, अतः उन्हें एक रथ दिया गया। 

भगीरथ गंगा को लेकर उसी जगह आये जहां उनके प्रपितामह आदि भस्म हुए थे। 

गंगा सबका उद्धार करती हुई सागर में मिल गयी। 

भगीरथ द्वारा लाये जाने के कारण गंगा का एक नाम भागीरथी भी पड़ा। 

जहां भगीरथ के पितरों का उद्धार हुआ, वही स्थान सागर द्वीप या गंगासागर कहलाता है। 

गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसमें बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। 

उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है।
हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!! 
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