वृन्दावन का लाला...!
एक दिन जब मैया ताने सुन सुनकर थक गयी तो उन्होंने भगवान को घर में ही बंद कर दिया जब आज गोपियों ने...!
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कन्हैया को नहीं देखा तो सब के सब उलाहना देने के
बहाने नंदबाबा के घर आ गयी और नंदरानी...!
यशोदा से कहने लगी- यशोदा तुम्हारे लाला बहुत
नटखट है, ये असमय ही बछडो को खोल देते है,
और जब हम दूध दुहने जाती है तो गाये दूध तो
देती नहीं लात मारती है।
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जिससे हमारी कोहनी भी टूटे
और दुहनी भी टूटे.घर मै
कही भी माखन छुपाकर रखो, पता
नहीं कैसे ढूँढ लेते है यदि इन्हें माखन
नहीं मिलता तो ये हमारे सोते हुए बच्चो को
चिकोटी काटकर भाग जाते है, ये माखन तो खाता
ही है।
साथ में माखन की
मटकी भी फोड़ देता है।
यशोदा जी कन्हैया का हाथ पकड़कर गोपियों के
बीच में खड़ा कर देती है और
कहती है कि ‘तौल-तौल लेओ वीर, जितनों
जाको खायो है, पर गली मत दीजो, मौ गरिबनी को जायो है’.
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जब गोपियों ने ये सुना तो वे कहने
लगी - यशोदा हम उलाहने देने नही
आये है आपने आज लाला को घर में ही बंद करके
रखा है हमने सुबह से ही उन्हें
नही देखा है इसलिए हम उलाहने देने के बहाने
उन्हें देखने आए थे.
जब यशोदा जी ने ये सुना तो वे प्रेम विभोर हो गई और कहने लगी-
गोपियों तुम मेरे लाला से इतना प्रेम
करती हो, आज से ये सारे वृन्दावन के लाला है।
श्याम नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊ गली गली,
लेलो रे ओ श्याम दीवानो टेर लगाऊ गली गली,
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दौलत के दीवानो सुन लो इक ऐसा आएगा,
धन दौलत सब खजाना पड़ा यही रह जाएगा,
सूंदर काया मिटी होगी चर्चा होगी गली गली,
लेलो रे ओ श्याम दीवानो टेर लगाऊ गली गली,
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भाई बंदु सगे सम्बन्धी एक दिन तुझे भुलायेंगे ,
जिनको तू अपना कहता है वो ही तुझे जलायगे,
दो दिन का ये चमन खिला है फिर मुरझाये कली कली,
लेलो रे ओ श्याम दीवानो टेर लगाऊ गली गली,
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झूठे धंधे छोड़ दे बंदे जप ले हरी के नाम की,
क्यों करते है तेरी मेरी त्याग दे तू अभिमान को,
तुझे समय यह फिर न मिलेगा फिर पछताए घड़ी घड़ी,
लेलो रे ओ श्याम दीवानो टेर लगाऊ गली गली,
✨ समय ही सर्वशक्तिमान है: एक पौराणिक सत्य ✨
हमारे शास्त्रों में एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है:
तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान।
भीलों लूटी गोपियां, वही अर्जुन वही बाण।।
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अर्थात: इस संसार में व्यक्ति महान नहीं होता, 'समय' महान और बलवान होता है।
समय ही है जो किसी को अर्श पर बिठाता है और किसी को फर्श पर।
इस का सबसे बड़ा उदाहरण महान धनुर्धर अर्जुन हैं।
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वही अर्जुन, जिनके गांडीव की टंकार से तीनों लोक कांपते थे, समय पलटने पर साधारण भीलों ( लुटेरों ) से गोपियों की रक्षा नहीं कर पाए।
आइये, इस सत्य के पीछे की पौराणिक कथा को जानते हैं:
यह उस समय की बात है जब गांधारी और दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण यदुवंश का अंत निकट था।
भगवान श्रीकृष्ण ने अपने स्वधाम गमन से पहले अर्जुन को द्वारका बुलाया और एक अंतिम महत्वपूर्ण कार्य सौंपा—"द्वारका की सभी स्त्रियों और गोपियों को सुरक्षित हस्तिनापुर ले जाओ।"
श्रीकृष्ण और यदुवंशियों के अंतिम संस्कार के बाद, शोक संतप्त अर्जुन द्वारका की स्त्रियों और अपार धन - संपदा को लेकर हस्तिनापुर के लिए निकले।
महायोद्धा की विवशता:
रास्ते में धन के लोभी भीलों और ग्रामीणों ने इस काफिले को घेर लिया।
अर्जुन को अपने पराक्रम पर पूरा भरोसा था।
उन्होंने उन्हें चेतावनी दी, परंतु जब लुटेरे नहीं माने, तो अर्जुन ने अपना विश्व प्रसिद्ध 'गांडीव' धनुष उठाया।
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लेकिन यह क्या?
अर्जुन बार - बार मंत्र पढ़कर अपने दिव्यास्त्रों का आह्वान कर रहे थे, किन्तु कोई भी दिव्यास्त्र प्रकट नहीं हुआ।
उनका दिव्य गांडीव एक साधारण लकड़ी के धनुष समान भारी हो गया।
अग्निदेव द्वारा दिया गया 'अक्षय तूणीर' ( जिसमें बाण कभी खत्म नहीं होते थे ) खाली हो गया।
महाभारत युद्ध में कौरवों की विशाल सेना का संहार करने वाले अर्जुन आज साधारण लुटेरों के सामने असहाय खड़े थे।
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देखते ही देखते भीलों ने गोपियों और संपत्ति को लूट लिया।
महर्षि व्यास का ज्ञान और समय का चक्र:
लज्जा और शोक में डूबे अर्जुन महर्षि वेदव्यास के पास पहुंचे और अपनी पराजय का कारण पूछा।
तब व्यासजी ने जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझाया:
"हे अर्जुन! शोक मत करो।
तुम जिस शक्ति पर गर्व करते थे, वह वास्तव में तुम्हारी थी ही नहीं।
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वह सारी शक्ति स्वयं श्रीकृष्ण की थी।
जब तक वे तुम्हारे साथ थे, तुम्हारी भुजाओं में बल और गांडीव में तेज था।
उनके स्वधाम जाते ही वह शक्ति भी चली गई।"
वेदव्यास जी ने आगे कहा: "अब नवयुग ( कलियुग ) का आरंभ हो रहा है।
समय बदल चुका है।
तुम्हारे अस्त्रों - शस्त्रों का प्रयोजन ( उद्देश्य ) पूरा हो चुका है।
किसी भी शक्ति का महत्व तभी तक रहता है जब तक संसार को उसकी आवश्यकता होती है।
यह जो कुछ भी हुआ, वह समय का फेर और प्रभु की इच्छा थी।"
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निष्कर्ष:
अर्जुन ने समय के इस परिवर्तन को स्वीकार किया।
उन्होंने श्रीकृष्ण की अंतिम आज्ञा मानकर उनके प्रपौत्र वज्रनाभ जी ( जिनके नाम पर ब्रजमंडल है ) का राज्याभिषेक किया।
यह कथा हमें सिखाती है कि शक्ति, पद और प्रतिष्ठा का अहंकार व्यर्थ है।
समय का चक्र जब घूमता है, तो परिस्थितियां बदलते देर नहीं लगती।
इस लिए सदैव विनम्र रहें।