pina_AIA2RFAWACV3EAAAGAAFWDL7MB32NGQBAAAAAITRPPOY7UUAH2JDAY7B3SOAJVIBQYCPH6L2TONTSUO3YF3DHBLIZTASCHQA https://www.profitablecpmrate.com/gtfhp9z6u?key=af9a967ab51882fa8e8eec44994969ec Adhiyatmik Astro: 10/28/25

Adsence

Tuesday, October 28, 2025

श्री लिंग महापुराण :

 🌷🌷श्री लिंग महापुराण🌷🌷

आदित्य वंश वर्णन में तण्डिकृत शिव सहस्त्रनाम.....! 

ऋषि बोले- हे सूतजी ! आदित्य वंश का और सोम वंश का हमारे प्रति वर्णन कीजिये ।

सूतजी बोले- अदिति ने कश्यप ऋषि के द्वारा आदित्य नामक पुत्र को उत्पन्न किया। 

आदित्य की चार पत्नी हुईं। 

वे संज्ञा, राज्ञी, प्रभा, छाया नाम वाली थीं। 

संज्ञा ने सूर्य के द्वारा मनु को उत्पन्न किया, राज्ञी ने यम यमुना और रैवत को पैदा किया। 

प्रभा ने आदित्य के द्वारा प्रभात को पैदा किया। 

छाया ने सूर्य से, सावर्णि, शनि, तपती तथा वृष्टि को पैदा किया। 

छाया अपने पुत्र से भी ज्यादा यम को प्रेम करती थी। 

मनु ने सहसका और क्रोध में आकर दाहिने पैर से उसे मारा। 

तब छाया अधिक दुखी हुई और यम का एक पैर खराब हो गया जिसमें राध रुधिर और कीड़ा पड़ गए। 

तब उसने गोकर्ण में जाकर हजारों वर्ष शिव की आराधना की। 

शिव के प्रसाद से उसे पितृ लोक का आधिपत्य मिला और शाप से छूट गया।







iPhone 17 Pro 1 TB: 15.93 cm (6.3″) Display with Promotion up to 120Hz, A19 Pro Chip, Breakthrough Battery Life, Pro Fusion Camera System with Center Stage Front Camera; Cosmic Orange

Visit the Apple Store  https://amzn.to/47IVPSe


प्रथम मनु से नौ पुत्र पैदा हुए। 

ये इक्ष्वाकु, नभग, धृष्णु, शर्याति, नारिश्यन्त, नाभाग, अरिष्ट, करुष, पृषध थे। 

इला, जेष्ठा, वरिष्ठा ये पुरुषत्व को प्राप्त हुईं। 

ये मनु की पुत्री थीं। 

इला का नाम सुद्युम्न हुआ। 

मनु यह सुद्युम्न नाम का पुत्र सोम वंश की वृद्धि करने वाला हुआ। 

उत्कल, गय, विनितास्व नामक इसके पुत्र उत्पन्न हुए।

+++ +++

हरीश्व से दृशदवती में बसुमना नाम का पुत्र हुआ। 

उसका पुत्र त्रिधन्वा नाम का हुआ। 

ब्रह्मा पुत्र तण्डि के द्वारा वह शिष्यता को प्राप्त हुआ। 

+++ +++

ब्रह्म पुत्र तडित ने शिव सहस्त्रनाम के द्वारा गाणपत्य पदवी को प्राप्त किया। 

ऋषि बोले- हे सूतजी ! 

शिवजी के सहस्त्रनाम को हमारे प्रति वर्णन करो। 

जिसके द्वारा तण्डि गाणपत्य पद को प्राप्त हुआ।

+++ +++

सूतजी बोले- हे ब्राह्मणो ! 

वह १०८ नाम से अधिक एक हजार ( ११०८ ) नाम वाला वह स्तोत्र मैं तुम्हें कहता हूँ सो सुनो। 

तब सूतजी ने शिव के स्थिर, स्थाणु, प्रभु, भानु, प्रवर, वरद, सर्वात्मा, सर्व विख्यात, सहस्त्राक्ष, विशालाक्ष, सोम, नक्षत्र, साधक, चन्द्र, शनि, केतु, ग्रह इत्यादि ११०८ नाम वाला महा पुण्यकारक स्तोत्र सुनाया। 

+++ +++

जिसको पढ़ने तथा ब्राह्मणों को सुनाने से हजार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। 

ब्रह्महत्या, शराब पीने वाला, चोर, गुरु की शैय्या पर शमन करने वाला, शरणागतघाती, मित्र विश्वास घातक, मातृ हत्यारा, वीर हत्यारा, भ्रूण हत्यारा आदि घोर पापी भी इसका शंकर के आश्रय में रहकर तीनों कालों में एक वर्ष तक लगातार जप करने पर सब पापों से छूट जाता है।

क्रमशः शेष अगले अंक में...!






श्रीमहाभारतम् 

।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।

( पौष्यपर्व )

तृतीयोऽध्यायः

जनमेजय को सरमा का शाप, जनमेजय द्वारा सोमश्रवा का पुरोहित के पद पर वरण, आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंक की गुरुभक्ति तथा उत्तंक का सर्पयज्ञ के लिये जनमेजय को प्रोत्साहन देना...!

सौतिरुवाच

जनमेजयः पारीक्षितः सह भ्रातृभिः कुरुक्षेत्रे दीर्घसत्रमुपास्ते । 
तस्य भ्रातरस्त्रयः श्रुतसेन उग्रसेनो भीमसेन इति । 
तेषु तत्सत्रमुपासीनेष्वागच्छत् सारमेयः ।। १ ।।

उग्रश्रवाजी कहते हैं- परीक्षित्‌के पुत्र जनमेजय अपने भाइयोंके साथ कुरुक्षेत्रमें दीर्घकालतक चलनेवाले यज्ञका अनुष्ठान करते थे। 

उनके तीन भाई थे- श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन। 

वे तीनों उस यज्ञमें बैठे थे। इतनेमें ही देवताओंकी कुतिया सरमाका पुत्र सारमेय वहाँ आया ।। १ ।।

+++ +++

स जनमेजयस्य भ्रातृभिरभिहतो रोरूयमाणो मातुः समीपमुपागच्छत् ।। २ ।।

जनमेजयके भाइयोंने उस कुत्तेको मारा। 
तब वह रोता हुआ अपनी माँके पास गया ।। २ ।।

तं माता रोरूयमाणमुवाच । 
किं रोदिषि केनास्यभिहत इति ।। ३ ।।

+++ +++

बार - बार रोते हुए अपने उस पुत्रसे माताने पूछा- 'बेटा! क्यों रोता है ? 

किसने तुझे मारा है?' ।। ३ ।।

स एवमुक्तो मातरं प्रत्युवाच जनमेजयस्य भ्रातृभिरभिहतोऽस्मीति ।। ४ ।।

माताके इस प्रकार पूछनेपर उसने उत्तर दिया- 'माँ! मुझे जनमेजयके भाइयोंने मारा है' ।। ४ ।।

+++ +++

तं माता प्रत्युवाच व्यक्तं त्वया तत्रापराद्धं येनास्यभिहत इति ।। ५ ।।

तब माता उससे बोली- 'बेटा! अवश्य ही तूने उनका कोई प्रकटरूपमें अपराध किया होगा, जिसके कारण उन्होंने तुझे मारा है' ।। ५ ।।

स तां पुनरुवाच नापराध्यामि किंचिन्नावेक्षे हवींषि नावलिह इति ।। ६ ।।

तब उसने मातासे पुनः इस प्रकार कहा- 'मैंने कोई अपराध नहीं किया है। न तो उनके हविष्यकी ओर देखा और न उसे चाटा ही है' ।। ६ ।।

+++ +++

तच्छ्रुत्वा तस्य माता सरमा पुत्रदुःखार्ता तत् सत्रमुपागच्छद् यत्र स जनमेजयः सह भ्रातृभिर्दीर्घ-सत्रमुपास्ते ।। ७ ।।

यह सुनकर पुत्रके दुःखसे दुःखी हुई उसकी माता सरमा उस सत्रमें आयी, जहाँ जनमेजय अपने भाइयोंके साथ दीर्घकालीन सत्रका अनुष्ठान कर रहे थे ।। ७ ।।

स तया क्रुद्धया तत्रोक्तोऽयं मे पुत्रो न किंचिदपराध्यति नावेक्षते हवींषि नावलेढि किमर्थमभिहत इति ।। ८ ।।

वहाँ क्रोधमें भरी हुई सरमाने जनमेजयसे कहा- 'मेरे इस पुत्रने तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया था, न तो इसने हविष्यकी ओर देखा और न उसे चाटा ही था, तब तुमने इसे क्यों मारा?' ।। ८ ।।

+++ +++

न किञ्चिदुक्तवन्तस्ते सा तानुवाच यस्मादयमभिहतोऽनपकारी तस्माददृष्टं त्वां भयमागमिष्यतीति ।। ९ ।।

किंतु जनमेजय और उनके भाइयोंने इसका कुछ भी उत्तर नहीं दिया। 

तब सरमाने उनसे कहा, 'मेरा पुत्र निरपराध था, तो भी तुमने इसे मारा है; अतः तुम्हारे ऊपर अकस्मात् ऐसा भय उपस्थित होगा, जिसकी पहलेसे कोई सम्भावना न रही हो' ।। ९ ।।

जनमेजय एवमुक्तो देवशुन्या सरमया भृशं सम्भ्रान्तो विषण्णश्चासीत् ।। १० ।।

देवताओंकी कुतिया सरमाके इस प्रकार शाप देनेपर जनमेजयको बड़ी घबराहट हुई और वे बहुत दुःखी हो गये ।। १० ।।

+++ +++

स तस्मिन् सत्रे समाप्ते हास्तिनपुरं प्रत्येत्य पुरोहितमनुरूपमन्विच्छमानः परं यत्नमकरोद् यो मे पापकृत्यां शमयेदिति ।। ११ ।।

उस सत्रके समाप्त होनेपर वे हस्तिनापुरमें आये और अपनेयोग्य पुरोहितकी खोज करते हुए इसके लिये बड़ा यत्न करने लगे। 

पुरोहितके ढूँढ़नेका उद्देश्य यह था कि वह मेरी इस शापरूप पापकृत्याको ( जो बल, आयु और प्राणका नाश करनेवाली है ) शान्त कर दे ।। ११ ।।

स कदाचिन्मृगयां गतः पारीक्षितो जनमेजयः कस्मिंश्चित् स्वविषय आश्रममपश्यत् ।। १२ ।।

एक दिन परीक्षित्पुत्र जनमेजय शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। 
वहाँ उन्होंने एक आश्रम देखा, जो उन्हींके राज्यके किसी प्रदेशमें विद्यमान था ।। १२ ।।

+++ +++

तत्र कश्चिदृषिरासांचक्रे श्रुतश्रवा नाम । 
तस्य तपस्यभिरतः पुत्र आस्ते सोमश्रवा नाम ।। १३ ।

उस आश्रममें श्रुतश्रवा नामसे प्रसिद्ध एक ऋषि रहते थे। 

उनके पुत्रका नाम था सोमश्रवा। 
सोमश्रवा सदा तपस्यामें ही लगे रहते थे ।। १३ ।।

तस्य तं पुत्रमभिगम्य जनमेजयः पारीक्षितः पौरोहित्याय वने ।। १४ ।।

परीक्षित्‌कुमार जनमेजयने महर्षि श्रुतश्रवाके पास जाकर उनके पुत्र सोमश्रवाका पुरोहितपदके लिये वरण किया ।। १४ ।।

+++ +++

स नमस्कृत्य तमृषिमुवाच भगवन्नयं तव पुत्रो मम पुरोहितोऽस्त्विति ।। १५ ।।

राजाने पहले महर्षिको नमस्कार करके कहा- 'भगवन्! आपके ये पुत्र सोमश्रवा मेरे पुरोहित हों' ।। १५ ।।

स एवमुक्तः प्रत्युवाच जनमेजयं भो जनमेजय पुत्रोऽयं मम सर्ष्या जातो महातपस्वी स्वाध्याय-सम्पन्नो मत्तपोवीर्यसम्भृतो मच्छुक्रं पीतवत्यास्तस्याः कुक्षौ जातः ।। १६ ।।

+++ +++

उनके ऐसा कहनेपर श्रुतश्रवाने जनमेजयको इस प्रकार उत्तर दिया- 'महाराज जनमेजय! 

मेरा यह पुत्र सोमश्रवा सर्पिणीके गर्भसे पैदा हुआ है। यह बड़ा तपस्वी और स्वाध्यायशील है। 

मेरे तपोबलसे इसका भरण-पोषण हुआ है। एक समय एक सर्पिणीने मेरा वीर्यपान कर लिया था, अतः उसीके पेटसे इसका जन्म हुआ है ।। १६ ।।

+++ +++

समर्थोऽयं भवतः सर्वाः पापकृत्याः शमयितु-मन्तरेण महादेवकृत्याम् ।। १७ ।।

यह तुम्हारी सम्पूर्ण पापकृत्याओं ( शापजनित उपद्रवों ) का निवारण करनेमें समर्थ है। 

केवल भगवान् शंकरकी कृत्याको यह नहीं टाल सकता ।। १७ ।।

अस्य त्वेकमुपांशुव्रतं यदेनं कश्चिद् ब्राह्मणः कंचिदर्थमभियाचेत् तं तस्मै दद्यादयं यद्येतदुत्सहसे ततो नयस्वैनमिति ।। १८ ।।

किंतु इसका एक गुप्त नियम है। 

+++ +++

यदि कोई ब्राह्मण इसके पास आकर इससे किसी वस्तुकी याचना करेगा तो यह उसे उसकी अभीष्ट वस्तु अवश्य देगा। 

यदि तुम उदारतापूर्वक इसके इस व्यवहारको सहन कर सको अथवा इसकी इच्छापूर्तिका उत्साह दिखा सको तो इसे ले जाओ' ।। १८ ।।

तेनैवमुक्तो जनमेजयस्तं प्रत्युवाच भगवंस्तत् तथा भविष्यतीति ।। १९ ।।

श्रुतश्रवाके ऐसा कहनेपर जनमेजयने उत्तर दिया- 

+++ +++

'भगवन्! सब कुछ उनकी रुचिके अनुसार ही होगा' ।। १९ ।।

स तं पुरोहितमुपादायोपावृत्तो भ्रातृनुवाच मयायं वृत उपाध्यायो यदयं ब्रूयात् तत् कार्यमविचारयद्भिर्भवद्भिरिति । 
तेनैवमुक्ता भ्रातरस्तस्य तथा चक्रुः । 
स तथा भ्रातृन् संदिश्य तक्षशिलां प्रत्यभिप्रतस्थे तं च देशं वशे स्थापयामास ।। २० ।।

फिर वे सोमश्रवा पुरोहितको साथ लेकर लौटे और अपने भाइयोंसे बोले- 

+++ +++

'इन्हें मैंने अपना उपाध्याय ( पुरोहित ) बनाया है। 

ये जो कुछ भी कहें, उसे तुम्हें बिना किसी सोच - विचारके पालन करना चाहिये।' 

जनमेजयके ऐसा कहनेपर उनके तीनों भाई पुरोहितकी प्रत्येक आज्ञाका ठीक - ठीक पालन करने लगे। 

इधर राजा जनमेजय अपने भाइयोंको पूर्वोक्त आदेश देकर स्वयं तक्षशिला जीतनेके लिये चले गये और उस प्रदेशको अपने अधिकारमें कर लिया ।। २० ।।

क्रमशः...!





Vivo V60 5G (Mist Gray, 8GB RAM, 256GB Storage) with No Cost EMI/Additional Exchange Offers

Visit the vivo Store  https://amzn.to/3LhpZDj


सुख की तलाश

हफ़ीज अफ़्रीका का एक़ किसान था, खेती करता जो ईश्वर इच्छा से प्राप्त हो जाता रब का शुक्र किया करता, वह अपनी ज़िन्दगी से ख़ुश और सन्तुष्ट था।

अफ्रीका में हर जगह हीरे की खदानें थीं, जहां से लोग हीरे तलाश कर दुनियां भर में बेचते और धनवान होते जाते। 

पर हफीज अपनी मेहनत से जो बन पड़ता अपना और अपने परिवार के लिये पूर्ण पाता और उसमें ही अपने परिवार के साथ खुशी से सुख पूर्वक रहता।

एक दिन हफीज का एक रिश्तेदार उसके घर पर आया,वो हीरों का बहुत बड़ा व्यपारी था, उसने हफीज को अफ्रीका में रहते हुये इस तरह गरीबी में रहते देखा तो उसे समझाने लगा, तुम हीरों का काम करो! 

+++ +++

जितनी मेहनत तुम खेती में करते हो पर कमाते जरूरत भर हो,अगर इतनी मेहनत तुम हीरे ढूंढने में लगाओ तो कहाँ से कहाँ पहुँच जाओगे। 

छोटे से छोटा हीरा भी बेसकीमती होता है और अगर कहीं अपने अंगूठे भर का भी हीरा पालो तो तुम एक पूरा शहर खरीद सकते हो,और कहीं मुठी भर जितना हीरा मिल जाये तो पूरा अफ्रीका तुम्हारा होगा। 

सोचो क्या सुख नहीं होगा तुम्हारे पास, हर सुख और सुविधायें, बड़ा घर,गाड़ियां,बच्चों और परिवार के ऐसों आराम की सभी जरूरतें।

वो रिश्तेदार ये बातें कर शाम को अपने घर लौट गया।

+++ +++

पर अपने पीछे एक चिंतित हफीज को छोड़ गया,आज उसे अपनी मेहनत की कमाई लानत लग रही थी,उसे ऐसा लग रहा था की वो बेकार में ही आदर्शवादी बना फिरता है,उसके जानने वाले सभी कहाँ से कहां पहुंच गये और वो आज भी वहीं का वहीं है,आज उसे अपनी खुद्दारी बोझिल सी लग रही थी,उस रात हफीज सो न सका,उसके मन में आज सन्तुष्टता की बजाये असंतुष्टा घर कर गई थी इसीलिये वो आज दुखी था।

अगले दिन सुबह हफीज काम पर नहीं गया,उसने अपने परिवार को बुला अपनी सारी बात उनके सामने रखी,अब मुझे जीवन का मकसद मिल गया है हमें भी अब अमीर होना है,अपने पति में यह परिवर्तन देख उसकी पत्नी ने समझना चाहा"हम अपनी छोटी सी दुनियां में बहुत सुख से हैं,नहीं चाहिये हमें कोई अन्य सुख सुविधायें, आप अपना यह विचार त्याग दीजिये।

पर अब हफीज पर अमीर बनने का जुनून सवार हो चुका था,हफ़ीज ने अपने खेतेां को बेचकर कुछ पैसे पत्नी को गुजर बसर के लिये दिये और हीरे खोज़ने के लिये रवाना हो गया। 

वह हीरों क़ी ख़ोज मेँ पूरे अफ़्रीका मेँ भटकता रहा पर ,बहुत परिश्रम भी किया पर उन्हें पा न सका। 

+++ +++

पर वो मायूस न हुआ उसने और आगे जाने की सोची।

उसने उन्हेँ यूरोप मेँ भी ढूंढा पर वे उसे वहां भी नहीँ मिलें । 

स्पेन पहुंचते - पहुंचते वह मानसिक,शारिरीक और आर्थिक  स्तर पर पूरी तरह टुट चुका था। 

उसका सारा धन समाप्त हो चुका था उसके पास उस दिन के खाने भर के लिये भी पैसे नहीं थे फिर भी वो भटकता रहा की काश मुझे कोई हीरा मिल जाये। 

+++ +++

पर आखिर वह इतना मायूस हो चुका था की उसने बर्सिलोना नदी मेँ कुदकर ख़ुद - ख़ुशी क़र अपनी जान दे दी।

ईधर जिस आदमी ने हफ़ीज के ख़ेत ख़रीदें थे वह एक़ दिन उन ख़ेतों से होंकर बहनें वाले नालेँ मेँ अपने ऊंटों को पानी पिला रहा था तभी सुबह के वक्त ऊग रहें सुरज क़ी किरणेँ नालेँ के दुसरी ओर पढ़े एक़ पत्थर पर पडी और वह इंद्र धनुष क़ी तरह जगमगा ऊठा।

बहुत ही सुंदर लग रहा था वो जैसे बर्फ को किसी ने किसी टोकरे में रख दिया हो। 

यह सोंचकर क़ी वह पत्थर उसकि बैठक मेँ अच्छा दिखेगा उसने उसे उठा क़र अपनी बैठक कक्ष मेँ सजा दिया,संजोग से आज वही हफीज का रिश्तेदार ख़ेतों के इस नए मालिक़ के पास आया,उसनें उस जगमगाते हुए पत्थर को देखा तो हैरानी से उछल पड़ा,ओह!इतना बड़ा और बेसकीमती पत्थर उसने जमीन के नये मालिक से - पूछा - क्या हफ़ीज लौट आया ?

नए मालिक़ ने जवाब दिया- 

नहीँ लेक़िन आपने यह सवाल क़्यों पूछा ?

+++ +++

अमीर रिश्तेदार आदमीं ने ज़वाब दिया क्योंकी यह हीरा हैँ, मैं उन्हें देखतें ही पहचान जाता हूँ ।

नए मालिक़ ने कहा- 

नहीँ यह तो महज एक़ पत्थर हैँ, मैने उसे नाले के पास से उठाया हैँ। 

चलिए मैं आपक़ो दीखाता हूँ, वहां ऐसे बहुत सारे पत्थर पड़े हुए हैँ।

+++ +++

उन्होनें वहां से बहुत सरे पत्थर उठाए और उन्हेँ जांचने परखने के लिये भेंज दिया।

वे सभी पत्थर हीरे ही साबित हुए। 

उन्होनें पाया क़ी उस ख़ेत में दूर - दूर तक़ हीरे दबे हुए थे। 

जमीन का नया मालिक दुनियां का सबसे अमीर आदमी बन चुका था।

+++ +++

कथा सार----

परमात्मा ने मुझे और सभी को अपनी प्रारब्ध अनुसार भरपूर दिया हुआ है। 

जो इस नेमत को न देख और, और ,और कि चाह में भटकते हैं, वे सदा दुख ही पाते हैं। 

उस की नेमत को देख ,अपनी भरपूरता का अनुभव कर सदेव मालिक का शुक्रगुजार होने में ही वास्तविक सुख है।

+++ +++

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -
श्री सरस्वति ज्योतिष कार्यालय
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Satvara vidhyarthi bhuvn,
" Shri Aalbai Niwas "
Shri Maha Prabhuji bethak Road,
JAM KHAMBHALIYA - 361305 (GUJRAT )
सेल नंबर: . + 91- 9427236337 / + 91- 9426633096  ( GUJARAT )
Vist us at: www.sarswatijyotish.com
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
Email: astrologer.voriya@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏
+++ +++