pina_AIA2RFAWACV3EAAAGAAFWDL7MB32NGQBAAAAAITRPPOY7UUAH2JDAY7B3SOAJVIBQYCPH6L2TONTSUO3YF3DHBLIZTASCHQA https://www.profitablecpmrate.com/gtfhp9z6u?key=af9a967ab51882fa8e8eec44994969ec Adhiyatmik Astro: धारी देवी के सर के पीछे है मीरा बाईसा के आखिरी पल:-

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Friday, February 27, 2026

धारी देवी के सर के पीछे है मीरा बाईसा के आखिरी पल:-

धारी देवी के सर के पीछे है मीरा बाईसा के आखिरी पल :-

धारी देवी के सर के पीछे है :

दिल दहला देने वाली कहानी :  

आज जानेंगे धारी देवी मंदिर के इतिहास के बारे में, जो की देवभूमि उत्तराखंड की सबसे प्रसिद्द देवी मानी जाती है, धारी देवी का मंदिर उत्तराखंड के पौड़ी  जिले में कल्यासौड़ नामक स्थान में धारी गांव में है, अलकनंदा  नदी के बीच में बसा ये मंदिर बेहद खूबसूरत है।

केदारनाथ और बद्रीनाथ जाते समय लोग धारी देवी के दर्शन जरूर करते है, माना जाता है की धारी देवी उत्तराखंड के चारो धामों की रक्षक है, माँ धारी के आशीर्वाद से ही लोग चार धाम की यात्रा सफल रूप से कर पाते है, लेकिन जब माँ धारी देवी अपने रौद्र रूप में होती है तो किसी को नहीं बख्शती।


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धारी देवी एक रहस्यमयी देवी है,जो भक्त माँ के इस मंदिर में आता है, वो यह चमत्कार अपनी आँखों से देख सकता है, जो भी यहाँ आया उसने देखा की माँ 1 दिन में अपने रूप को एक दिन में तीन बार बदलती है, सुबह छोटी बालिका के रूप में, दिन में यौन अवस्था में, और संध्या को वृद्ध अवस्था में अपने भक्तो को दर्शन देती है।  

इसके साक्ष वो लोग है जो यहाँ माँ के दर्शन सच्चे दिल से करने आते है, माँ धारी का रौद्र रूप तब देखने को मिला था जब अलकनंदा नदी से कुछ किलोमीटर आगे विद्युत् बनाने के लिए डैम बनना था, और उस के लिए माँ धारी देवी के मंदिर को शिफ्ट करने की बात रखी गयी क्युकी माता का मंदिर ठीक अलकनंदा नदी के बीचो बीच स्थित है, तो जब माँ की मूर्ति अपने स्थान से उठाई गयी तो उसके ठीक 2 से 4 घंटे के बीच केदारनाथ से एक सैलाब आया जिसने लाखो जिन्दगिया तबाह कर दी, केदारनाथ में बाढ़ आना माँ के गुस्से का प्रकोप माना जाता है, क्युकी पंडितो ने भी मूर्ती को न हटाने के लिए कहा था, लेकिन सरकार के आदेश पर मूर्ती  हटा दी गयी जिसके बाद उत्तराखंड में केदारनाथ से आई आपदा का नुक्सान कई ज़िंदगियों को चुकाना पड़ा।  

माँ धारी का मंदिर चारो धामों के रक्षक के रूप में जाना जाता है।

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धारी देवी की पौराणिक मान्यताये

      धारी देवी कौन थी-


माँ धारी के 7 भाई थे और अपने भाइयो से माँ धारी बहुत  प्रेम करती थी, लेकिन उनके भाई उनको बिलकुल पसंद नहीं करते  थे, इसके दो कारण  थे, पहला की उनका रंग  बहुत  ज्यादा सांवला था और दूसरा की उनको पता चल गया था की उनकी बहन के ग्रह उन भाइयो के लिए अच्छे नहीं है , जब तक ये छोटी बच्ची है तब  तक उनके जीवन को संकट है, माँ पिता  के गुजर जाने के बाद भाइयो ने उनका ध्यान रखा इस लिए वो उन पर अपनी जान छिड़कती थी , लेकिन भाइयो की नफरत और डर बढ़ने लगा, धीरे धीरे समय बीतता  गया और 7 में से 5 भाइयो की अकस्मात्  मौत हो गयी ये देख कर बाकि के बचे दो भाइयो की अपनी जान का खतरा बन गया।

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एक दिन  उन दो भाइयो और उनकी पत्नियों ने मिलकर योजना बनाई की इस लड़की को मार देते है जिससे उनकी जान बाच जाये।  

फिर एक रत को सबने मिलकर अपनी बहन का गला काट दिया और उसे  अलकनंदा नदी में बहा   दिया , उस छोटी बच्ची का गला बहते  हुए कल्यासौड़ नाम के स्थान पर धारी गांव के पास अलकनंदा नदी के बीच एक पत्थर  से टकराया , जैसे ही गला धारी गांव में पहुंचा तो एक आदमी ने देखा नदी में एक लड़की बहती हुई आ रही है उस लड़के ने लड़की को बचाना चाहा जो सिर्फ एक गला था लेकिन बहाव तेज़ होने की वजह से वो नदी में नहीं जा पा रहा था।

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तभी एक आकाशवाणी होती है की डरो मत मेरे पास आओ और मुझे बचाओ तुमको कुछ नहीं होगा, तू जहाँ जहाँ पैर रखेगा में वहाँ वहाँ पे तेरे लिए सीढ़ी बना दूँगी, कहा जाता है कि कुछ समय पहले ये सीडिया यहाँ पर दिखाई देती थीं।

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वह लड़का धीरे धीरे नदी के पास जाता है और सर को उठता है और डर जाता तो देखता है की यह तो कटा हुआ है तो आवाज़ कहा से आ रही है, तो गले से आवाज़ आती है की डर मत में स्वयं देवी स्वरुप हु मुझे एक पवित्र स्थान में स्थापित करदे, वो लड़का भी अचंभित था की नदी में सीडिया बनना, कटे हुए सर से आवाज़ आना, ये अवश्य ही देवी स्वरुप है, जब लड़के ने एक पत्थर पर सर को स्थापित किया तब माँ ने अपनी सारी कहानी बताई , और उसके बाद उस कटे हुए सर ने एक पत्तर का रूप लिया और वही पर धारी  गांव की देवी के नाम से प्रसिद्द हुई , वहीँ जो उनका धड़ वाला हिस्सा था वो रुद्रप्रयाग कालीमठ में  है और माँ मैथानी के नाम से प्रसिद्द है,और यहाँ माँ धारी का भव्य मंदिर भी स्थित है।

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धारी देवी मंदिर कहाँ है।


धारी देवी मंदिर उत्तराखंड राज्य के पोड़ी जिले में श्रीनगर गढ़वाल में अलकनंदा नदी के तट पर श्रीनगर बद्रीनाथ राजमार्ग पर कल्यासोड़ में स्थित है।


           || मां धारी देवी की जय हो ||

।।श्रीहरिः।।


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मीरा बाईसा के  आखिरी पल:-

द्वारिकाधीश की मंगला आरती हो चुकी थी और पुजारी जी द्वार के पास खड़े थे। 

दर्शनार्थी दर्शन करते हुये आ जा रहे थे ।

राणावतों और मेड़तियों के साथ मीरा मंदिर के परिसर में पहुँची ।

मीरा ने प्रभु को प्रणाम किया ।

पुजारी जी मीरा को पहचानते थे और उन्हें यह विदित था कि इन्हें लिवाने के लिए मेवाड़ के बड़े बड़े सामन्तों सहित राजपुरोहित आयें है ।

चरणामृत और तुलसी देते हुये उन्होंने पूछा - " क्या निश्चित किया ? 

क्या जाने का निश्चय कर लिया है ? 

आपके बिना द्वारिका सूनी हो जायेगी ।" 

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" हाँजी महाराज ! 

वही निश्चित नहीं कर पा रही !! अगर आप आज्ञा दें तो भीतर जाकर प्रभु से ही पूछ लूँ !!!" 


" हाँ हाँ !! पधारो बा !! 

आपके लिए मन्दिर के भीतर जाने में कोई भी बाधा नहीं !!!"-

पुजारी जी ने अतिशय सम्मान से कहा।

पुजारी जी की आज्ञा ले मीरा मन्दिर के गर्भगृह में गई ।

ह्रदय से प्रभु को प्रणाम कर मीरा इकतारा हाथ में ले वह गाने लगी........!

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मीरा को प्रभु साँची दासी बनाओ।

झूठे धंधों से मेरा फंदा छुड़ाओ॥


लूटे ही लेत विवेक का डेरा।

बुधि बल यदपि करूं बहुतेरा॥


हाय! हाय! नहिं कछु बस मेरा।

मरत हूं बिबस प्रभु धाओ सवेरा॥


धर्म उपदेश नितप्रति सुनती हूं।

मन कुचाल से भी डरती हूं॥


सदा साधु - सेवा करती हूं।

सुमिरण ध्यान में चित धरती हूं॥


भक्ति - मारग दासी को दिखलाओ।

मीरा को प्रभु सांची दासी बनाओ॥

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अंतिम पंक्ति गाने से पूर्व मीरा ने इकतारा मंगला के हाथ में थमाया और गाती हुईं धीमें पदों से गर्भ गृह के भीतर वह ठाकुर जी के समक्ष जा खड़ी हुईं। 

वह एकटक द्वारिकाधीश को निहारती बार बार गा रही थी -" मिल बिछुरन मत कीजे ।"  

एका एक मीरा ने देखा कि उसके समक्ष विग्रह नहीं ब्लकि स्वयं द्वारिकाधीश वर के वेश में खड़े मुस्कुरा रहे है। मीरा अपने प्राणप्रियतम के चरण स्पर्श के लिए जैसे ही झुकी , दुष्टों का नाश , भक्तों को दुलार , शरणागतों को अभय और ब्रह्माण्ड का पालन करने वाली सशक्त भुजाओं ने आर्त ,विह्वल और शरण माँगती हुई अपनी प्रिया को बन्धन में समेट लिया |

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जय - जय मीरा गोपाल 


क्षण मात्र के लिए एक अभूतपूर्व प्रकाश प्रकट हुआ , मानों सूर्य - चन्द्र एक साथ अपने पूरे तेज़ के साथ उदित होकर अस्त हो गये हों ।

इसी प्रकाश में प्रेमदीवानी मीरा समा गई 

जय - जय मीरा गोपाल 

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उसी समय मंदिर के सारे घंटे - घड़ियाल और शंख स्वयं ज़ोर ज़ोर से एक साथ बज उठे। 

कई क्षण तक वहाँ पर खड़े लोगों की समझ में नहीं आया कि क्या हुआ ।

एकाएक चमेली " बाईसा हुकम " पुकारती मंदिर के गर्भ गृह की ओर दौड़ी। 

पुजारी जी ने सचेत होकर हाथ के संकेत से उसे रोका और स्वयं गर्भ गृह में गये ।

उनकी दृष्टि चारों ओर मीरा को ढूँढ रही थी ।

अचानक प्रभु के पाशर्व में लटकता भगवा -वस्त्र खंड दिखाई दिया। 

वह मीरा की ओढ़नी का छोर था। 

लपक कर उन्होंने उसे हाथ में लिया ।

पर मीरा कहीं भी मन्दिर में दिखाई नहीं दी ।

निराशा के भाव से भावित हुए पुजारी ने गर्भ गृह से बाहर आकर न करते हुए सिर हिला दिया। 

उनका संकेत समझ सब हतोत्साहित एवं निराश हो गये । 

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" यह कैसे सम्भव है ? 

अभी तो हमारे सामने उन्होंने गाते हुये गर्भ गृह में प्रवेश किया है ।

भीतर नहीं हैं तो फिर कहाँ है ? 

हम मेवाड़ जाकर क्या उत्तर देंगें। "- वीर सामन्त बोल उठे ।

" मैं भी तो आपके साथ ही बाहर था ।मैं कैसे बताऊँ कि वह कहाँ गई ? 

स्थिति से तो यही स्पष्ट है कि मीरा बाई प्रभु में समा गई , उनके विग्रह में लीन हो गई। 

" पुजारी जी ने उत्तर दिया। 

पर चित्तौड़ और मेड़ता के वीरों ने पुजारी जी की आज्ञा ले स्वयं गर्भ गृह के भीतर प्रवेश किया। 

दोनों पुरोहितों ने मूर्ति के चारों ओर घूम कर मीरा को ढूँढने का प्रयास किया ।

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सामन्तों ने दीवारों को ठोंका , फर्श को भी बजाकर देखा कि कहीं नीचे से नर्म तो नहीं !! 

अंत में जब निराश होकर बाहर निकलने लगे तो पुजारी ने कहा ," आपको बा की ओढ़नी का पल्ला नहीं दिखता , अरे बा प्रभु में समा गई है। " 

दोनों पुरोहितों ने पल्ले को अच्छी तरह से देखा और खींचा भी , पर वह तनिक भी खिसका नहीं , तब वह हताश हो बाहर आ गये ।

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इस समय तक ढोल - नगारे बजने आरम्भ हो गये थे ।

पुजारी जी ने भुजा उठाकर जयघोष किया -

" बोल , मीरा माँ की जय ! द्वारिकाधीश की जय !!

भक्त और भगवान की जय !!! " 

लोगों ने जयघोष दोहराया - जय - जय मीरा गोपाल 

तीनों दासियों का रूदन वेग मानों बाँध तोड़कर बह पड़ा हो। 

अपनी आँखें पौंछते हुये दोनों पुरोहित उन्हें सान्तवना दे रहे थे ।

इस प्रकार मेड़ता और चित्तौड़ की मूर्तिमंत गरिमा अपने अराध्य में जा समायी

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नृत्यत नुपूर बाँधि के गावत ले करतार,

देखत ही हरि में मिली तृण सम गनि संसार ॥

मीरा को निज लीन किय नागर नन्दकिशोर ,

जग प्रतीत हित नाथ मुख रह्यो चुनरी छोर ॥

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दोनों की साध पूरी हुयी, न जाने कितने जन्मों की प्रतीक्षा के बाद। 

आत्मा और परमात्मा का मिलन

दो होकर एक एक होकर दो 

जय श्री मीरा माधव जी..........!

हे नाथ!हे मेरे नाथ!!आप बहुत ही कृपालु हैं!!!

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🙏जय जय श्री राधे कृष्ण🙏

हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!! 

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -

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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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