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Thursday, January 15, 2026

स्वस्तिवाचन मन्त्र ( अर्थ सहित ) :

स्वस्तिवाचन मन्त्र ( अर्थ सहित ) / प्रसिद्ध आरती ओम्_जय_जगदीश_हरे के रचयिता कौन हैं ? / आज गंगा सागर यात्रा विशेष : 

स्वस्तिवाचन मन्त्र ( अर्थ सहित ) :


हमारे देश की यह प्राचीन परंपरा रही है कि जब कभी भी हम कोई कार्य प्रारंभ करते है, तो उस समय मंगल की कामना करते है और सबसे पहले मंगल मूर्ति गणेश की प्रार्थना करते है। 


इस के लिए दो नाम हमारे सामने आते हैं... पहला श्रीगणेश और दूसरा जय गणेश।



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श्रीगणेश का अर्थ होता है कि जब हम किसी कार्य को आरंभ करते है, तो इसी नाम के साथ उस कार्य की शुरुआत करते है। 

जय गणेश का अर्थ होता है कि अब यह कार्य यहां समाप्त हो रहा है।

प्राचीनकाल से ही वैदिक मंत्रों में जितनी ऋचाएं आई है, उनके चिन्तन, वाचन से अलौकिक दिव्य शक्ति की प्राप्ति होती है, मन शान्त होता है। 
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किसी भी शुभ कार्य के प्रारम्भ में, विवाह मण्डप पर, शगुन और तिलक में भी इसकी प्रथा है, या फिर जब कभी भी हम कोई मांगलिक कार्य करते है तो स्वस्तिवाचन की परंपरा रही है। 

यह एक गहन विज्ञान है, जिसे समझने की आवश्यकता है।

यदि हम केवल मंगल वचन का प्रयोग करे और मांगलिक शब्दों का प्रयोग उसके अर्थ को बिना जाने हुए करे तो निश्चय ही यह हमारा अंधविश्वास माना जाएगा। 

जब तक धर्म को तथा उसके विज्ञान को हम समझ न लें, तब तक केवल अंधविश्वासी होकर उसकी सभी बातों को मानने का कोई औचित्य नहीं है। 

हमारा धर्म, हमारी संस्कृति,वैदिक ऋचाएं, वैदिक मंत्र, पुराण उपनिषद आदि इन सभी ग्रन्थों पृष्टभूमि में विज्ञान निहित है। 

हमारे ऋषियों ने जिन वैदिक ऋचाओं और पुराणों की कल्पना की, उपनिषदों के बारे में सोचा था फिर मांगलिक कार्यो के लिए जैसी व्यवस्था की, वह हमारे विज्ञान से किसी भी तरह से अलग नहीं है। 
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उनके द्वारा सोची और की जाने वाली हर एक पहल हमेशा से ही विज्ञान के साथ रही है। 

मन्त्र-1 आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।
देवा नोयथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥ 

अर्थ  हमारे पास चारों ओर से ऐंसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। 

प्रगति को न रोकने वाले और सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिए तत्पर रहें।

मन्त्र-2 देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम्।
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥ 

अर्थ  यजमान की इच्छा रखने वाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु को जीने के निमित्त बढ़ायें।
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मन्त्र-3 तान् पूर्वयानिविदाहूमहे वयंभगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्।
अर्यमणंवरुणंसोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्।।

अर्थ  हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा और अश्विनीकुमारों का आवाहन करते हैं। 

ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करें।

मन्त्र-4 तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत् पिता द्यौः ।
तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥ 

अर्थ  वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। 

माता पृथ्वी और पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। 

सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। 

हे अश्विनी - कुमारो! आप दोनों सबके आधार हैं, हमारी प्रार्थना सुनिये।
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मन्त्र-5 तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम् ।
पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥

अर्थ  हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष देनेवाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। 

वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि और कल्याण के निमित्त हों।

मन्त्र-6  स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पुषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

अर्थ  महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, सबके पोषणकर्ता वे पूषा ( सूर्य ) हमारा कल्याण करें। 

जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। 

वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।
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मन्त्र-7  पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः ।
अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ॥ 

अर्थ  चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सबका कल्याण करने वाले, यज्ञशालाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण और विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में आयें।

मन्त्र-8  भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥

अर्थ  हे यजमान के रक्षक देवताओं! हम दृढ अङ्गों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए कानों से कल्याण की बातें सुनें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें।
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मन्त्र-9  शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम ।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः॥

अर्थ  हे देवताओं! आप सौ वर्ष की आयु - पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र, पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जाएँ, हमारी उस गमनशील आयु को आपलोग बीच में खण्डित न होने दें।

मन्त्र-10 अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।
विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम॥

अर्थ  अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष - रुप है, वही पराशक्ति माता - पिता और पुत्र भी है। 
समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है और जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।
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मन्त्र-11 ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थ  द्युलोक शान्तिदायक हों, अन्तरिक्ष लोक शान्तिदायक हों, पृथ्वीलोक शान्तिदायक हों। 

जल, औषधियाँ और वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। 

सभी देवता, सृष्टि की सभी शक्तियाँ शान्तिदायक हों। 

ब्रह्म अर्थात महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों। 
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उनका दिया हुआ ज्ञान, वेद शान्ति देने वाले हों। 

सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हों अर्थात सब जगह शान्ति ही शान्ति हो। 

ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो और वह सदा बढ़ती ही रहे। 

अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण - कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। 

समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो।

।। जय श्री हरि ।।

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प्रसिद्ध आरती ओम्_जय_जगदीश_हरे के रचयिता कौन हैं ? 

ओम् जय जगदीश हरे, आरती आज हर हिन्दू घर में गाई जाती है. इस आरती की तर्ज पर अन्य देवी देवताओं की आरतियाँ बन चुकी है और गाई जाती है, परंतु इस मूल आरती के रचयिता के बारे में काफी कम लोगों को पता है. इस आरती के रचयिता थे पं. श्रद्धाराम_शर्मा या श्रद्धाराम_फिल्लौरी. पं. श्रद्धाराम शर्मा का जन्म पंजाब के जिले जालंधर में स्थित फिल्लौर शहर में हुआ था वे सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संगीतज्ञ तथा हिन्दी और पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे. उनका विवाह सिख महिला महताब कौर के साथ हुआ था.बचपन से ही उन्हें ज्यौतिष और साहित्य के विषय में गहरी रूचि थी.

उन्होनें वैसे तो किसी प्रकार की शिक्षा हासिल नहीं की थी परंतु उन्होंने सात साल की उम्र तक गुरुमुखी में पढाई की और दस साल की उम्र तक वे संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी भाषाओं तथा ज्योतिष की विधा में पारंगत हो चुके थे.
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उन्होने पंजाबी ( गुरूमुखी ) में ‘सिक्खां दे राज दी विथियाँ’ और ‘पंजाबी बातचीत’ जैसी पुस्तकें लिखीं. ‘सिक्खां दे राज दी विथियाँ’ उनकी पहली किताब थी. इस किताब में उन्होनें सिख धर्म की स्थापना और इसकी नीतियों के बारे में बहुत सारगर्भित रूप से बताया था. यह पुस्तक लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय साबित हुई थी और अंग्रेज सरकार ने तब होने वाली आईसीएस ( जिसका भारतीय नाम अब आईएएस हो गया है ) परीक्षा के कोर्स में इस पुस्तक को शामिल किया था. पं. श्रद्धाराम शर्मा गुरूमुखी और पंजाबी के अच्छे जानकार थे और उन्होनें अपनी पहली पुस्तक गुरूमुखी मे ही लिखी थी परंतु वे मानते थे कि हिन्दी के माध्यम से ही अपनी बात को अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाया जा सकता है. 


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हिन्दी के जाने माने लेखक और साहित्यकार पं. रामचंद्र शुक्ल ने पं. श्रद्धाराम शर्मा और भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिन्दी के पहले दो लेखकों में माना है.

उन्होनें 1877 में भाग्यवती नामक एक उपन्यास लिखा था जो हिन्दी में था. माना जाता है कि यह हिन्दी का पहला उपन्यास है. इस उपन्यास का प्रकाशन 1888 में हुआ था. 

इसके प्रकाशन से पहले ही पं. श्रद्धाराम का निधन हो गया परंतु उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने काफी कष्ट सहन करके भी इस उपन्यास का प्रकाशन करावाया था वैसे पं. श्रद्धाराम शर्मा धार्मिक कथाओं और आख्यानों के लिए काफी प्रसिद्ध थे. वे महाभारत का उध्दरण देते हुए अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जनजागरण का ऐसा वातावरण तैयार कर देते थे उनका आख्यान सुनकर प्रत्यैक व्यक्ति के भीतर देशभक्ति की भावना भर जाती.

इस से अंग्रेज सरकार की नींद उड़ने लगी और उसने 1865 में पं. श्रद्धाराम को फुल्लौरी से निष्कासित कर दिया और आसपास के गाँवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी.लेकिन उनके द्वारा लिखी गई किताबों का पठन विद्यालयों में हो रहा था और वह जारी रहा.निष्कासन का उन पर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि उनकी लोकप्रियता और बढ गई.निष्कासन के दौरान उन्होनें कई पुस्तकें लिखी और लोगों के सम्पर्क में रहे. पं. श्रद्धाराम ने अपने व्याख्यानों से लोगों में अंग्रेज सरकार के खिलाफ क्रांति की मशाल ही नहीं जलाई बल्कि साक्षरता के लिए भी ज़बर्दस्त काम किया. 1870 में उन्होने एक ऐसी आरती लिखी जो भविष्य में घर घर में गाई जानी थी.
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वह आरती थी – ऑम जय जगदीश हरे…पं. शर्मा जहाँ कहीं व्याख्यान देने जाते ओम जय जगदीश आरती गाकर सुनाते.

उनकी यह आरती लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगी और फिर तो आज कई पीढियाँ गुजर जाने के बाद भी यह आरती गाई जाती रही है और कालजई हो गई है.

इस आरती का उपयोग प्रसिद्ध निर्माता निर्देशक मनोज कुमार ने अपनी एक फिल्म में किया था और इस लिए कई लोग इस आरती के साथ मनोज कुमार का नाम जोड़ देते हैं.
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पं. शर्मा सदैव प्रचार और आत्म प्रशंसा से दूर रहे थे. शायद यह भी एक वजह हो कि उनकी रचनाओं को चाव से पढने वाले लोग भी उनके जीवन और उनके कार्यों से परिचित नहीं हैं. 24 जून 1881 को लाहौर में पं. श्रद्धाराम शर्मा ने आखिरी सांस ली ।

आज गंगा सागर यात्रा विशेष :

सारे तीरथ बार - बार गंगा सागर एक बार जाने क्यों

गंगा सागर को तीर्थों का पिता कहा जाता है, कहने का तात्पर्य है कि गंगा सागर का अन्य तीर्थों की अपेक्षा अत्यधिक महत्व है। 

शायद यही कारण है कि जन साधारण में यह कहावत बहुत प्रचलित है कि- ''सब तीरथ बार - बार, गंगा सागर एक बार।'

' गंगा जिस स्थान पर समुद्र में मिलती है, उसे गंगा सागर कहा गया है। 

गंगा सागर एक बहुत सुंदर वन द्वीप समूह है जो बंगाल की दक्षिण सीमा में बंगाल की खाड़ी पर स्थित है। 
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प्राचीन समय में इसे पाताल लोक के नाम से भी जाना जाता था। 

कलकत्ते से यात्री प्रायः जहाज में गंगा सागर जाते हैं। 

यहां मेले के दिनों में काफी भीड़ - भाड़ व रौनक रहती है। 

लेकिन बाकी दिनों में शांति एवं एकाकीपन छाया रहता है। 

तीर्थ स्थान - सागर द्वीप में केवल थोड़े से साधु ही रहते हैं। 

यह अब वन से ढका और प्रायः जनहीन है। 

इस सागर द्वीप में जहां गंगा सागर मेला होता है, वहां से एक मील उत्तर में वामनखल स्थान पर एक प्राचीन मंदिर है।

इस समय जहां गंगा सागर पर मेला लगता है, पहले यहीं गंगाजी समुद्र में मिलती थी, किंतु अब गंगा का मुहाना पीछे हट गया है। 
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अब गंगा सागर के पास गंगाजी की एक छोटी धारा समुद्र से मिलती है। 

आज यहां सपाट मैदान है और जहां तक नजर जाती है वहां केवल घना जंगल। 

मेले के दिनों में गंगा के किनारे पर मेले के लिए स्थान बनाने के लिए इन जंगलों को कई मीलों तक काट दिया जाता है। 

गंगा सागर का मेला मकर संक्रांति को लगता है। 

खाने - पीने के लिए होटल, पूजा - पाठ की सामग्री व अन्य सामानों की भी बहुत - सी दुकानें खुल जाती हैं। 

सारे तीर्थों का फल अकेले गंगा सागर में मिल जाता है। 

संक्रांति के दिन गंगा सागर में स्नान का महात्म्य सबसे बड़ा माना गया है। 

प्रातः और दोपहर स्नान और मुण्डन - कर्म होता है। 

यहां पर लोग श्राद्ध व पिण्डदान भी करते हैं।
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कपिल मुनि के मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं, इसके बाद लोग लौटते हैं ओर पांचवें दिन मेला समाप्त हो जाता है। 

गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसमें बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। 

उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है। 

इसके अलावा यहां सांखय योग के आचार्य कपिलानंद जी का आश्रम, महादेव मंदिर, योगेंद्र मठ, शिव शक्ति - महानिर्वाण आश्रम और भारत सेवाश्रम संघ का विशाल मंदिर भी हैं।

रामायण में एक कथा मिलती है जिसके अनुसार कपिल मुनि किसी अन्य स्थान पर तपस्या कर रहे थे। 
ऐसे ही समय में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सगर एक अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने लगे। 

उनके अश्वमेध यज्ञ से डरकर इंद्र ने राक्षस रूप धारण कर यज्ञ के अश्व को चुरा लिया और पाताल लोक में ले जाकर कपिल के आश्रम में बांध दिया। 
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राजा सगर की दो पत्नियां थीं- केशिनी और सुमति। 

केशिनी के गर्भ से असमंजस पैदा हुआ और सुमति के गर्भ से साठ हजार पुत्र। 

असमंजस बड़ा ही उद्धत प्रकृति का था। 

वह प्रजा को बहुत पीड़ा देता था। अतः सगर ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया था। 

अश्वमेध का घोड़ा चुरा लिये जाने के कारण सगर बड़ी चिंता में पड़ गये। 

उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को अश्व ढूंढने के लिए कहा। 

साठों हजार पुत्र अश्व ढूंढते ढूंढते - ढूंढते पाताल लोक में पहुंच गये। 

वहां उन लोगों ने कपिल मुनि के आश्रम में यज्ञीय अश्व को बंधा देखा। 

उन लोगों ने मुनि कपिल को ही चोर समझकर उनका काफी अपमान कर दिया। 

अपमानित होकर ऋषि कपिल ने सभी को शाप दिया- 'तुम लोग भस्म हो जाओ।
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' शाप मिलते ही सभी भस्म हो गये। पुत्रों के आने में विलंब देखकर राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान, जो असमंजस का पुत्र था, को पता लगाने के लिए भेजा। 

अंशुमान खोजते - खोजते पाताल लोक पहुंचा। 

वहां अपने सभी चाचाओं को भस्म रूप में परिणत देखा तो सारी स्स्थिति समझ गया। 

उन्होंने कपिल मुनि की स्तुति कर प्रसन्न किया। 

कपिल मुनि ने उसे घोड़ा ले जाने की अनुमति दे दी और यह भी कहा कि यदि राजा सगर का कोई वंशज गंगा को वहां तक ले आये तो सभी का उद्धार हो जाएगा। 

अंशुमान घोड़ा लेकर अयोध्या लौट आया। 

यज्ञ समाप्त करने के बाद राजा सगर ने 30 हजार वर्षों तक राज्य किया और अंत में अंशुमान को राजगद्दी देकर स्वर्ग सिधार गये। 

अंशुमान ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का काफी प्रयत्न किया, लेकिन सफल नहीं हो पाया। 

अंशुमान के पुत्र दिलीप ने दीर्घकाल तक तपस्या की। 

लेकिन वह भी सफल नहीं हो पाया। 

दिलीप के पुत्र भगीरथ ने घोर तपस्या की। 
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गंगा ने आश्वासन दिया कि मैं जरूर पृथ्वी पर आऊंगी, लेकिन जिस समय मैं स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आऊंगी, उस समय मेरे प्रवाह को रोकने के लिए कोई उपस्थित होना चाहिए। 

भगीरथ ने इसके लिए भगवान शिव को प्रसन्न किया। 

भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटा में धारण कर लिया। 

भगीरथ ने उन्हें पुनः प्रसन्न किया तो शिवजी ने गंगा को छोड़ दिया।

गंगा शिवजी के मस्तक से सात स्रोतों में भूमि पर उतरी। 

ह्रानिदी, पावनी और नलिनी नामक तीन प्रवाह पूर्व की ओर चल गये, वड.क्ष, सीता तथा सिंधु नामक तीन प्रवाह पश्चिम की ओर चले गये और अंतिम एक प्रवाह भगीरथ के बताए हुए मार्ग से चलने लगा। 

भगीरथ पैदल गंगा के साथ नहीं चल सकते थे, अतः उन्हें एक रथ दिया गया। 

भगीरथ गंगा को लेकर उसी जगह आये जहां उनके प्रपितामह आदि भस्म हुए थे। 

गंगा सबका उद्धार करती हुई सागर में मिल गयी। 

भगीरथ द्वारा लाये जाने के कारण गंगा का एक नाम भागीरथी भी पड़ा। 

जहां भगीरथ के पितरों का उद्धार हुआ, वही स्थान सागर द्वीप या गंगासागर कहलाता है। 

गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसमें बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। 

उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है।
हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!! 
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Wednesday, January 14, 2026

|| मकर सक्रांति पर्व ||

|| मकर सक्रांति पर्व ||

|| मकर सक्रांति पर्व ||

        14-15 जनवरी 2026 

 

इस वर्ष मकर संक्रांति का पर्व 14 व 15 जनवरी 2026 के दिन मनाया जाएगा 


मकर संक्रांति सूर्य की उपासना का पर्व है। 

इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने पर खरमास की भी समाप्ति हो जाती है और सभी मांगलिक कार्य पुनः शुरू हो जाते हैं। 

पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होते हैं और ऐसे शुभ संयोग में मकर संक्रांति पर स्नान, दान, मंत्र जप और सूर्य उपासना से अन्य दिनों में किए गए दान-धर्म से अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है।


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आइए जानते हैं मकर संक्रांति का पुण्य और महापुण्य काल समय-: 


पुण्य काल‌ का समय-: 


* 14 जनवरी 2026, बुधवार, दोपहर 3:13 से अगले दिन 15 जनवरी को सुबह 08:00 बजे तक रहेगा। 

महापुण्य काल 14 जनवरी, दोपहर 3:13 से शाम 4:58 तक रहेगाl

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▪️षटतिला एकादशी व्रत (14 जनवरी)-: 

* यदि आप 14 जनवरी को पुण्य काल के दौरान किसी तरह का दान पुण्य करना चाहते हैं तो इस दिन तिल, फल एवं फलाहारी वस्तुओं से ही हो पाएगा, क्योंकि इस दिन षट्तिला एकादशी व्रत है अतः इस दिन किसी भी तरह का अनाज (अन्न) खाना व खिलाना वर्जित माना जाता है।


खिचड़ी का भोग व दान पुण्य 15 जनवरी-: 

* मकर संक्रांति पर खिचड़ी का सेवन और दान पुण्य करने की परंपरा काफी पुरानी है। यह स्वास्थ्य व संस्कृति से जुड़ी हुई परंपरा है। 14 जनवरी को षट्तिला एकादशी व्रत होने की वजह से इस दिन खिचड़ी का सेवन करना एवं दान- पुण्य करना बिल्कुल भी उचित नहीं होगा, अतः इसका दान- पुण्य व सेवन इत्यादि 15 जनवरी को करना उचित रहेगा।

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पुण्य काल का महत्व-: 

* मकर संक्रांति पर पुण्य का विशेष महत्व है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन से स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं. मकर संक्रांति के पुण्य काल में गंगा स्नान, सूर्योपासना, दान, मंत्र जप करने व्यक्ति के जन्मों के पाप धुल जाते है।


▪️स्नान-: 

* मकर सक्रांति वाले दिन सबसे पहले प्रातः किसी पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए, यदि यह संभव ना हो सके तो अपने नहाने के जल में थोड़ा गंगाजल डालकर स्नान किया जा सकता है।

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▪️सूर्योपासना-: 

* प्रातः स्नान के बाद उगते हुए सूर्य नारायण को तांबे के पात्र में जल, गुड, लाल पुष्प, गुलाब की पत्तियां, कुमकुम आदि मिलाकर जल अर्पित करना चाहिए।


▪️मंत्र जप-: 

* सूर्य उपासना के बाद में कुछ देर आसन पर बैठकर मंत्र, नाम जप, श्री गीता के पाठ इत्यादि करने चाहिए और अपने इष्ट देवी- देवताओं की भी उपासना करनी चाहिए।

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▪️गाय के लिए दान-: 

* पूजा उपासना से उठने के बाद गाय के लिए कुछ दान अवश्य निकालना चाहिए, जैसे- गुड, चारा इत्यादिl


▪️पितरों को भी करे याद-: 

* इस दिन अपने पूर्वजों को प्रणाम करना ना भूलें, उनके निमित्त भी कुछ दान अवश्य निकालें। इस दिन पितरों को तर्पण करना भी शुभ होता है। इससे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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▪️गरीब व जरूरतमंदों के लिए दान-: 

* इस दिन गरीब व जरूरतमंदों को जूते, चप्पल, (चप्पल- जूते चमड़े के नहीं होने चाहिए) अन्न, तिल, गुड़, चावल, मूंग, गेहूं, वस्त्र, कंबल, का दान करें। ऐसा करने से शनि और सूर्य देव की कृपा प्राप्त होती हैl


▪️खिचड़ी का दान 15 जनवरी को करें-: 

* खिचड़ी में चावल, दाल, घी और तिल जैसे तत्व होते हैं। 

ये केवल स्वादिष्ट ही नहीं होते बल्कि शरीर को ऊर्जा और पोषण भी देते हैं। 

धार्मिक मान्यता है कि यह सूर्य देव से जुड़ा भोजन है. इसे खाने या जरूरतमंदों को देने से स्वास्थ्य और मानसिक शांति मिलती है। 

मकर संक्रांति के दिन यह दान देने का विशेष महत्व है लेकिन इस बार 14 जनवरी को षट्तिला एकादशी का व्रत भी रहेगा अतः एकादशी तिथि पर चावल खाना एवं खिलाना दोनों ही  वर्जित होते हैं अतः यह दान 15 जनवरी को देना चाहिएl

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▪️परंपराओं का भी रखें ध्यान-:

* मकर सक्रांति का त्यौहार मनाने में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग- अलग परंपराएं हैं, अतः आप अपनी परंपराओं का भी ध्यान रखें। 

अर्थात अपने क्षेत्रीय रीति-रिवाजों के अनुसार मकर संक्रांति का त्यौहार मनाना चाहिएl


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मकरसंक्रांति पर्व :


ऋतु परिवर्तन का सूचक  ही नहीं सनातनके उत्कर्ष, खगोल,विज्ञान और लोक संस्कृति के मिलन का अनुपम संगम है मकर संक्रांति। 

वैदिक काल से ही इस पर्व की महत्ता है।


सूर्यआत्मा'जगत:तस्थुषश्च'

( चर - अचर की आत्मा ) कहा गया है। 

ऋग्वेद के अनुसार, सूर्य ऊर्जा और चेतना का स्रोत है। 

मकरसंक्रांति से 'उत्तरायण' का आरंभ होता है।

उपनिषदों ( विशेषकर छांदोग्य ) में उत्तरायण को 'देवयान' मार्ग कहा गया है। 

यह तमसोर्माज्योतिर्गमय व मृत्योर्मामृतंगमय का प्रतीकहै।

ज्योतिषीय दृष्टि से जब सूर्य धनु राशि को त्याग,पुत्र शनि की राशि 'मकर' में संक्रमण करते हैं, तो इसे मकर संक्रांति कहते हैं।

ज्योतिष में सूर्य 'आत्मा' है और शनि 'कर्म/अनुशासन'। 

पिता ( सूर्य ) का पुत्र ( शनि ) के घर जाना अहंकार त्याग और कर्तव्य के समन्वय का प्रतीक है। 

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मकर से दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी। 

यह इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान ( प्रकाश ) का प्रभाव अज्ञान ( अंधकार ) पर बढ़ने लगा है।

पुराणों में इस दिन को अत्यंत पवित्र माना गया है, जिससे कई दिव्य कथाएँ जुड़ी हैं:

महाभारत के अनुसार, इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त भीष्म ने उत्तरायण की प्रतीक्षा कर देह त्याग मोक्षप्राप्ति सुगम बनाई। 

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इसी दिनभागीरथी के कपिलाश्रम  होते हुए सागर में जा मिली थीं। 

इस लिए 'गंगासागर' स्नान का इस दिन विशेष महत्व है।

भगवानविष्णु ने इसी दिन असुर संहार, उनके सिर मंदार पर्वत पर दबा दिए, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

संतों ने मकर संक्रांति को केवल बाहरी कर्मकांड तक सीमित न रखकर इसे 'मन के रूपांतरण' से जोड़ा है।गोस्वामी तुलसीदास: रामचरितमानस में कहते हैं;

माघ मकरगत रवि जब होई। 

तीरथपतिहिं आवसब कोई॥ 

यहाँ 'तीर्थराज' का आसय प्रयाग में संतसंगति और अंतःकरण की शुद्धि से भी है।

मन के विकार भी शुद्ध करें,तभीत्रिवेणीजल में स्नान से मुक्ति संभव।वास्तविक संक्रांतिमें विचारों की 'समरसता' ( खिचड़ी की भांति )आए।खिचड़ी में अक्षत  ( चंद्र - शीतलता ),दाल ( मंगल - ऊर्जाघी ( सूर्य / तेज ),हल्दी ( गुरु / ज्ञान ) का मिश्रण होता है। 

संतों ने इसे सामाजिक समरसता और एकता का प्रतीक माना है।


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मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ के सेवन का गहरा दर्शन है। 

तिल सूक्ष्मता और तपस्या का प्रतीक है,जबकि गुड़ मिठास और प्रेम का। 

जैसे तिल रगड़ने पर तेल देता है और गुड़ आग में तपकर मिठास, वैसे ही मनुष्य को साधना की भट्ठी में तपकर अपने व्यक्तित्व में प्रेम और ज्ञान की मिठास लानी चाहिए।

मकर संक्रांति हमें जड़ता से चेतनता की ओर बढ़ने का आह्वान करती है। 

यह पर्व सिखाता है कि जीवन निरंतर गतिमान है ( संसरण ), और इस गति की दिशा 'प्रकाश' ( ज्ञान ) की ओर होनी चाहिए।

काशी कीगलियों से लेकर गंगातट तक, यह पर्व 'शिव' और 'शक्ति' के सामंजस्य का उत्सव है जहाँ जीव शिवत्व की ओर बढ़ता है।

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मकरसंक्रांति पर्व की सभी साधक सदस्य को अग्रिम शुभकामनाएं एवं बधाई📯🚩

मकर संक्रांति विशेष

हमारे पवित्र पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति का पर्व ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, आद्यशक्ति और सूर्य की आराधना एवं उपासना का पावन व्रत है, जो तन - मन - आत्मा को शक्ति प्रदान करता है। 

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संत-महर्षियों के अनुसार इसके प्रभाव से प्राणी की आत्मा शुद्ध होती है। 

संकल्प शक्ति बढ़ती है। 

ज्ञान तंतु विकसित होते हैं। 

मकर संक्रांति इसी चेतना को विकसित करने वाला पर्व है। 

यह संपूर्ण भारत वर्ष में किसी न किसी रूप में आयोजित होता है।


पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर एक महीने के लिए जाते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है। 

हालांकि ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य और शनि का तालमेल संभव नहीं, लेकिन इस दिन सूर्य खुद अपने पुत्र के घर जाते हैं। 

इस लिए पुराणों में यह दिन पिता - पुत्र के संबंधों में निकटता की शुरुआत के रूप में देखा जाता है।

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इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत करके युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। 

उन्होंने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इस लिए यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।


एक अन्य पुराण के अनुसार गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। 

उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। 

इस लिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है।

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विष्णु धर्मसूत्र में कहा गया है कि पितरों की आत्मा की शांति के लिए एवं स्व स्वास्थ्यवर्द्धन तथा सर्वकल्याण के लिए तिल के छः प्रयोग पुण्यदायक एवं फलदायक होते हैं- तिल जल से स्नान करना, तिल दान करना, तिल से बना भोजन, जल में तिल अर्पण, तिल से आहुति, तिल का उबटन लगाना।


सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से देवों की ब्रह्म मुहूर्त उपासना का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाता है। 

इस काल को ही परा - अपरा विद्या की प्राप्ति का काल कहा जाता है। 

इसे साधना का सिद्धिकाल भी कहा गया है। 

इस काल में देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण, यज्ञ कर्म आदि पुनीत कर्म किए जाते हैं। 

मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व से ही व्रत उपवास में रहकर योग्य को दान देना चाहिए।

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रामायण काल से भारतीय संस्कृति में दैनिक सूर्य पूजा का प्रचलन चला आ रहा है। 

राम कथा में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा नित्य सूर्य पूजा का उल्लेख मिलता है। 

रामचरित मानस में ही भगवान श्री राम द्वारा पतंग उड़ाए जाने का भी उल्लेख मिलता है। 

मकर संक्रांति का जिक्र वाल्मिकी रचित रामायण में मिलता है। 


राजा भगीरथ सूर्यवंशी थे, जिन्होंने भगीरथ तप साधना के परिणामस्वरूप पापनाशिनी गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पूर्वजों को मोक्ष प्रदान करवाया था। 

राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों का गंगाजल, अक्षत, तिल से श्राद्ध तर्पण किया था। 

तब से माघ मकर संक्रांति स्नान और मकर संक्रांति श्राद्ध तर्पण की प्रथा आज तक प्रचलित है। 

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कपिल मुनि के आश्रम पर जिस दिन मां गंगे का पदार्पण हुआ था, वह मकर संक्रांति का दिन था। 

पावन गंगा जल के स्पर्श मात्र से राजा भगीरथ के पूर्वजों को स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी। 

कपिल मुनि ने वरदान देते हुए कहा था, 'मातु गंगे त्रिकाल तक जन - जन का पापहरण करेंगी और भक्तजनों की सात पीढ़ियों को मुक्ति एवं मोक्ष प्रदान करेंगी। 

गंगा जल का स्पर्श, पान, स्नान और दर्शन सभी पुण्यदायक फल प्रदान करेगा।' 


महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था। 

उनका श्राद्ध संस्कार भी सूर्य की उत्तरायण गति में हुआ था। 

फलतः आज तक पितरों की प्रसन्नता के लिए तिल अर्घ्य एवं जल तर्पण की प्रथा मकर संक्रांति के अवसर पर प्रचलित है।


सूर्य की सातवीं किरण भारत वर्ष में आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देने वाली है। 

सातवीं किरण का प्रभाव भारत वर्ष में गंगा - जमुना के मध्य अधिक समय तक रहता है। 

इस भौगोलिक स्थिति के कारण ही हरिद्वार और प्रयाग में माघ मेला अर्थात मकर संक्रांति या पूर्ण कुंभ तथा अर्द्धकुंभ के विशेष उत्सव का आयोजन होता है।


जैसे कि पितृ तुल्य भगवान भास्कर दक्षिणायन से उत्तरायण में जा रहे हैं

ऊर्जामयी रश्मियाँ अपना प्रवास बढ़ाने वाली हैं 

अतुल्य शक्ति स्त्रोत प्रकृति अंधेरी रातें छोटी कर

दिन का उजाला बढ़ाने वाली है

धरती माता उदरस्त अनाज को पकाने वाली है 

मल्टी विटामिन से भरपूर "तिल" "गुड़" के साथ मिलकर रक्त का भी शोधन करने वाला है

जब सब कुछ ही अच्छा होने वाला है

तो क्यों न मनोभावों की निराशा का संक्रमण कर सकारात्मकता और व्यवहार में नवीन ऊर्जा का संचार कर जीवन में मंगल बढ़ाया जाए और सही अर्थों में संक्रांति उत्सव मनाया जाए..


☄सभी को मकर संक्रान्ति की हार्दिक मंगलकामनाये☄

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पौ‍राणिक घटनाएं जो मकरसंक्रांति को बनाती है खास


गंगा जी मिली थी गंगा सागर में  मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथजी के पीछे - पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। 

महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था इस लिए मकर संक्रांति पर गंगासागर में मेला लगता है। 

राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों का गंगाजल, अक्षत, तिल से श्राद्ध तर्पण किया था। 

तब से ही माघ मकर संक्रांति स्नान और मकर संक्रांति श्राद्ध तर्पण की प्रथा आज तक प्रचलित है। 

पावन गंगा जल के स्पर्श मात्र से राजा भगीरथ के पूर्वजों को स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी। 

कपिल मुनि ने वरदान देते हुए कहा था, 'मातु गंगे त्रिकाल तक जन - जन का पापहरण करेंगी और भक्तजनों की सात पीढ़ियों को मुक्ति एवं मोक्ष प्रदान करेंगी। 

गंगा जल का स्पर्श, पान, स्नान और दर्शन सभी पुण्यदायक फल प्रदान करेगा।'


एक कथा के अनुसार एक बार राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ किया और अपने अश्व को विश्व - विजय के लिए छोड़ दिया। 

इंद्रदेव ने उस अश्व को छल से कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। 

जब कपिल मुनि के आश्रम में राजा सगर के 60 हजार पुत्र युद्ध के लिए पहुंचे तो कपिल मुनि ने श्राप देकर उन सब को भस्म कर दिया। 

राजकुमार अंशुमान, राजा सगर के पोते ने कपिल मुनि के आश्रम में जाकर विनती की और अपने बंधुओं के उद्धार का रास्ता पूछा। 

तब कपिल मुनि ने बाताया कि इनके उद्धार के लिये गंगाजी को धरती पर लाना होगा। 

तब राजा अंशुमन ने तप किया और अपनी आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश दिया। 

बाद में अंशुमान के पुत्र दिलीप के यहां भागीरथ का जन्म हुआ और उन्होंने अपने पूर्वज की इच्छा पूर्ण की।


श्रीहरि विष्णु ने किया था असुरों का वध इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत करके युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। 

उन्होंने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। 

इस लिए यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।

 

सूर्यवंशी राजा करते हैं सूर्य की पूजा रामायण काल से ही भारतीय संस्कृति में दैनिक सूर्य पूजा का प्रचलन चला आ रहा है। 

रामकथा में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा नित्य सूर्य पूजा का उल्लेख मिलता है। 

मकर संक्रांति के दिन सूर्य की विशेष आराधना होती है।


सूर्य की सातवीं किरण सूर्य की सातवीं किरण भारतवर्ष में आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देने वाली है। 

सातवीं किरण का प्रभाव भारत वर्ष में गंगा-जमुना के मध्य अधिक समय तक रहता है। 

इस भौगोलिक स्थिति के कारण ही हरिद्वार और प्रयाग में माघ मेला अर्थात मकर संक्रांति या पूर्ण कुंभ तथा अर्द्धकुंभ के विशेष उत्सव का आयोजन होता है।

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भीष्म पितामह  महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने का ही इंतजार किया था। 

कारण कि उत्तरायण में देह छोड़ने वाली आत्माएं या तो कुछ काल के लिए देवलोक में चली जाती हैं या पुनर्जन्म के चक्र से उन्हें छुटकारा मिल जाता है। 

उनका श्राद्ध संस्कार भी सूर्य की उत्तरायण गति में हुआ था। 

फलतः आज तक पितरों की प्रसन्नता के लिए तिल अर्घ्य एवं जल तर्पण की प्रथा मकर संक्रांति के अवसर पर प्रचलित है।

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सूर्य जाते हैं अपने पुत्र शनि के घर हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार इसी दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर एक महीने के लिए जाते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है। 

कथा के अनुसार सूर्यदेव ने शनि और उनकी माता छाया को खुद से अलग कर दिया था, जिसके कारण शनि के प्रकोप के चलते उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। 

तब सूर्यदेव के दूसरे बेटे यमराज ने इ रोग को ठीक किया था। 

रोगमुक्त होने के बाद सूर्यदेव ने क्रोध में आकर उनके घर कुंभ को जला दिया था। 

परंतु बाद में यमराज के समझाने पर वे जब शनि के घर गए तो उन्होंने वहां देखा कि सबकुछ जल चुका था केवल काला तिल वैसे का वैसा रखा था। 

अपने पिता को देखकर शनिदेव ने उनका स्वागत उसी काले तिल से किया। 

इस से प्रसन्न होकर सूर्य ने उन्हें दूसरा घर ‘मकर’ उपहार में दे दिया। 

इस के बाद सूर्यदेव ने शनि को कहा कि जब वे उनके नए घर मकर में आएंगे, तो उनका घर फिर से धन और धान्य से भर जाएगा। 

साथ ही कहा कि मकर संक्रांति के दिन जो भी काले तिल और गुड़ से मेरी पूजा करेगा उसके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।


यशोदाजी ने किया था व्रत  कहते हैं कि माता यशोदा जी ने श्रीकृष्‍णजी के लिए व्रत किया था तब सूर्य उत्तरायण हो रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति थी। 

तभी से मकर संक्रांति के व्रत का प्रचलन प्रारंभ हुआ।


उत्तरायण होता है सूर्य तब देवताओं का दिन प्रारंभ होता है।

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मकर संक्रांति के दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण गति करने लगते हैं। 

इस दिन से देवताओं का छह माह का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। 

सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से देवों की ब्रह्म मुहूर्त उपासना का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाता है। 

इस काल को ही परा - अपरा विद्या की प्राप्ति का काल कहा जाता है। 

इसे साधना का सिद्धिकाल भी कहा गया है। 

इस काल में देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण, यज्ञ कर्म आदि पुनीत कर्म किए जाते हैं। 

मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व से ही व्रत उपवास में रहकर योग्य पात्रों को दान देना चाहिए।


सूर्य संस्कृति में मकर संक्रांति का पर्व ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, आद्यशक्ति और सूर्य की आराधना एवं उपासना का पावन व्रत है, जो तन - मन - आत्मा को शक्ति प्रदान करता है।* 

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संत - महर्षियों के अनुसार इसके प्रभाव से प्राणी की आत्मा शुद्ध होती है। 

संकल्प शक्ति बढ़ती है। 

ज्ञान तंतु विकसित होते हैं। 

मकर संक्रांति इसी चेतना को विकसित करने वाला पर्व है।

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विष्णु धर्मसूत्र में कहा गया है कि पितरों की आत्मा की शांति के लिए एवं स्व स्वास्थ्यवर्द्धन तथा सर्वकल्याण के लिए तिल के छः प्रयोग पुण्यदायक एवं फलदायक होते हैं- तिल जल से स्नान करना, तिल दान करना, तिल से बना भोजन, जल में तिल अर्पण, तिल से आहुति, तिल का उबटन लगाना।*,,

🌹🌹 हर हर महादेव 🌹🌹

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