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Tuesday, December 16, 2025

मलमास, अधिकमास, पुरुषोत्तम मास,

मलमास, अधिकमास, पुरुषोत्तम मास,

     अहंस्पति, मलिम्लुच और संसर्प।


खर मास प्रारंभ

मंत्र – 

गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणम्।

  गोकुलोत्सवमीशानं गोविन्दं गोपिकाप्रियम्।।

यह पुरुषोत्तम मास का सबसे विशेष मंत्र है।

श्रद्धापूर्वक इस मंत्र के जाप से व्यक्ति के जीवन से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में खुशियों का वास होता है मलमास, अधिकमास या पुरुषोत्तम मास एक ही माह के नाम है और इनका संबंध चंद्र की गति से है जबकि खरमास का संबंध सूर्य की गति से है। 

हर सौर वर्ष में 2 बार खरमास आते हैं। 

पहला सूर्य जब धनु राशि में प्रवेश करता है और दूसरा सूर्य जब मीन राशि में प्रवेश करता है तब खरमास प्रारंभ होता है।


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ऐसी मान्यता है कि इस मंत्र का जप करते समय पीले वस्त्र धारण करने चाहिए, अत्यंत लाभ प्राप्त होता है।

इस के साथ ही पूजा तथा हवन के साथ दान करना भी लाभकारी माना गया है।

इसे मल मास काला महीना भी कहा जाता है। 

इस महीने का आरंभ 16 दिसम्बर से होता है और ठीक मकर संक्रांति को खर मास की समाप्ति होती है। 

खर मास के दौरान हिन्दू जगत में कोई भी धार्मिक कृत्य और शुभ मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। 

इसके अलावा यह महीना अनेक प्रकार के घरेलू और पारम्परिक शुभकार्यों की चर्चाओं के लिए भी वर्जित है।

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देशाचार के अनुसार नवविवाहिता कन्या भी खर मास के अन्दर पति के साथ संसर्ग नहीं कर सकती है । 

और उसे इस पूरे महीने के दौरान अपने मायके में आकर रहना पड़ता है । 

इस वर्ष भी खर मास 15 दिसम्ब से आरम्भ हो रहे है।

खर मास में सभी प्रकार के हवन, विवाह चर्चा, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, द्विरागमन, यज्ञोपवीत,विवाह या अन्य हवन कर्मकांड आदि तक का निषेध है। 

सिर्फ भागवत कथा या रामायण कथा का सामूहिक श्रवण ही खर मास में किया जाता है।

ब्रह्म पुराण के अनुसार खर मास में मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति नर्क का भागी होता है। 

अर्थात चाहे व्यक्ति अल्पायु हो या दीर्घायु अगर वह पौष के अन्तर्गत खर मास यानी मल मास की अवधि में अपने प्राण त्याग रहा है तो निश्चित रूप से उसका इहलोक और परलोक नर्क के द्वार की तरफ खुलता है।

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इस बात की पुष्टि महाभारत में होती है जब खर मास के अन्दर अर्जुन ने भीष्म पितामह को धर्म युद्ध में बाणों की शैया से वेध दिया था। 

सैकड़ों बाणों से विद्ध हो जाने के बावजूद भी भीष्म पितामह ने अपने प्राण नहीं त्यागे। 

प्राण नहीं त्यागने का मूल कारण यही था कि अगर वह इस खर मास में प्राण त्याग करते हैं तो उनका अगला जन्म नर्क की ओर जाएगा। 

इसी कारण उन्होंने अर्जुन से पुनः एक ऐसा तीर चलाने के लिए कहा जो उनके सिर पर विद्ध होकर तकिए का काम करे। 

इस प्रकार से भीष्म पितामह पूरे खर मास के अन्दर अर्द्ध मृत अवस्था में बाणों की शैया पर लेटे रहे और जब सौर माघ मास की मकर संक्रांति आई उसके बाद शुक्ल पक्ष की एकादशी को उन्होंने अपने प्राणों का त्याग किया। 

इस लिए कहा गया है कि माघ मास की देह त्याग से व्यक्ति सीधा स्वर्ग का भागी होता है।

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खर मास को खर मास क्यों कहा जाता है यह भी एक पौराणिक किंवदंती है। 

खर गधे को कहते हैं। 

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार सूर्य अपने साथ घोड़ों के रथ में बैठकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करते है। 

और परिक्रमा के दौरान कहीं भी सूर्य को एक क्षण भी रुकने की इजाजत नहीं है। 

लेकिन सूर्य के सातों घोड़े सारे साल भर दौड़ लगाते- लगाते प्यास से तड़पने लगे। 

उनकी इस दयनीय स्थिति से निबटने के लिए सूर्य एक तालाब के निकट अपने सातों घोड़ों को पानी पिलाने हेतु रुकने लगे।

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लेकिन तभी उन्हें यह प्रतिज्ञा याद आई कि घोड़े बेशक प्यासे रह जाएं लेकिन उनकी यात्रा ने विराम नहीं लेना है। 

नहीं तो सौर मंडल में अनर्थ हो जाएगा। 

सूर्य भगवान ने चारों ओर देखा… तत्काल ही सूर्य भगवान पानी के कुंड के आगे खड़े दो गधो को अपने रथ पर जोत कर आगे बढ़ गए और अपने सातों घोड़े तब अपनी प्यास बुझाने के लिए खोल दिए गए। 

अब स्थिति ये रही कि गधे यानी खर अपनी मन्द गति से पूरे पौष मास में ब्रह्मांड की यात्रा करते रहे और सूर्य का तेज बहुत ही कमजोर होकर धरती पर प्रकट हुआ।

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मकर संक्रांति के दिन से सूर्य पुनः अपने सात अश्वों पर सवार होकर आगे बढ़े और धरती पर सूर्य का तेजोमय प्रकाश धीरे-धीरे बढ़ने लगा। 

मकर संक्रांति एक महत्व यह भी है कि उस दिन सूर्य अपने अधम सवारी से मुक्त होकर असली अश्व रथ पर आरूढ़ हुए और दुनिया को अपनी ऊर्जा से प्रभावित करते रहे।


आगामी मलमास ( खरमास ) 15 दिसंबर 2025 ( सोमवार ) से शुरू होकर 14 जनवरी 2026 ( बुधवार ) तक रहेगा, जिसमें सूर्य के धनु राशि में प्रवेश के कारण विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे सभी शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे, और इस दौरान जप, तप, दान तथा सूर्य देव की पूजा का विशेष महत्व है, खासकर मकर संक्रांति तक।


       || गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणो ||


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जयत्यंजनी-गर्भ-अंभोधि-संभूत

विधु विबुध- कुल- कैरवानंदकारी।


केसरी-चारु-लोचन-चकोरक-सुखद,

  लोकगन शोक- संतापहारी।।


जयति जय बालकपि केलि-कौतुक

 उदित- चंडकर-मंडल- ग्रासकर्त्ता ।


राहु-रवि-शक्र,पवि-गर्व-खर्वीकरण

 शरण- भयहरण जय भुवन भर्त्ता ।।

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हे हनुमान जी!आपकी जय हो।

आप अंजनी के गर्भ रूपी समुद्रसे चन्द्ररूप उत्पन्न होकर देव-कुलरूपी कुमुदों को प्रफुल्लित करने वाले हैं, पिता केसरी के सुंदर नेत्र रूपी चकोरों को आनन्द देने वाले हैंऔर समस्त लोकों का शोक-संताप हरने वाले हैं।

आपकी जय हो,जय हो।अपने बचपन में ही बाललीलासे उदयकालीन प्रचण्ड सूर्य के मण्डल को लाल-लाल खिलौना समझकर निगल लिए थे।

उस समय आपने राहु, सूर्य, इन्द्र और वज्रका गर्व चूर्ण कर दिया था। 

हे शरणागत के भय हरने वाले!हे विश्वका भरण-पोषण करने वाले!!आपकी जय हो।

श्रीवत्साकं महादेवं देवगुह्यमनौपमम् 

  प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यमभयप्रदम्।

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प्रभवं सर्वभूतानां निर्गुणं परमेश्वरम्

प्रपद्ये  मुक्तसङ्गानां यतीनां परमां गतिम्।।


मैं श्रीवत्स - चिह्र धारण करने वाले, महान् देव,देवताओं में गुह्य, उपमा से रहित, सूक्ष्म, अचल तथा अभय देने वाले वरेण्य देव की शरण ग्रहण करता हूं।

मैं  समस्त प्राणियों की सृष्टि करने वाले, निर्गुण, नि: सङ्ग, यम और नियम का पालन करने वाले संन्यासियों की परम गति स्वरूप परमेश्वर की शरण ग्रहण करता हूं।'


         || बालाजी महाराज की जय हो ||

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|| लड्डू गोपाल की बहन ||


ब्रजमंडल क्षेत्र में एक जंगल के पास एक गाँव बसा था।

जंगल के किनारे ही एक टूटी-फूटी झोपड़ी में एक सात वर्षीया बालिका अपनी बूढ़ी दादी के साथ रहा करती थी। 

जिसका नाम उसकी दादी ने बड़े प्रेम से चंदा रखा था।

चंदा का उसकी दादी के अतिरिक्त और कोई सहारा नहीं था,उसके माता पिता की मृत्यु एक महामारी में उस समय हो गई थी जब चंदा की आयु मात्र दो वर्ष ही थी, तब से उसकी दादी ने ही उसका पालन-पोषण किया था।


उस बूढ़ी स्त्री के पास भी कमाई का कोई साधन नहीं था इस लिए वह जंगल जाती और लकड़िया बीन कर उनको बेचती और उससे जो भी आय होती उससे ही उनका गुजारा चलता था। 

क्योंकि घर में और कोई नहीं था इसलिए दादी चंदा  को भी अपने साथ जंगल ले जाती थी। 

दोनों दादी-पोती दिन भर जंगल में भटकते और संध्या होने से पहले घर वापस लौट आते ... यही उनका प्रति दिन का नियम था।

चंदा अपनी दादी के साथ बहुत प्रसन्न रहती थी, किन्तु उसको एक बात बहुत कचोटती थी कि उसका कोई भाई या बहन नहीं थे। 

गांव के बच्चे उसको इस बात के लिए बहुत चिढ़ाते थे तथा उसको अपने साथ भी नहीं खेलने देते थे, इससे वह बहुत दुःखी रहती थी।


अनेक बार वह अपनी दादी से पूछती की उसका कोई भाई क्यों नहीं है। 

तब उसकी दादी उसको प्रेम से समझाती,कौन कहता है कि तेरा कोई भाई नहीं है, वह है ना कृष्ण कन्हैया वही तेरा भाई है, यह कह कर दादी लड्डू गोपाल की और संकेत कर देती। 

चंदा की झोपडी में एक पुरानी किन्तु बहुत सुन्दर लड्डू गोपाल की प्रतीमा थी जो उसके दादा जी लाये थे। 

चंदा की दादी उनकी बड़े मन से सेवा किया करती थी। 

बहुत प्रेम से उनकी पूजा करती और उनको भोग लगाती।

निर्धन स्त्री पकवान मिष्ठान कहाँ से लाये जो उनके खाने के लिए रुखा सूखा होता वही पहले भगवान को भोग लगाती फिर चंदा के साथ बैठ कर खुद खाती। 

चंदा के प्रश्न सुनकर वह उस लड्डू गोपाल की और ही संकेत कर देती।

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बालपन से चंदा लड्डू गोपाल को ही अपना भाई मानने लगी। 

वह जब दुःखी होती तो लड्डू गोपाल के सम्मुख बैठ कर उनसे बात करने लगती और कहती की भाई तुम मेरे साथ खेलने क्यों नहीं आते,सब बच्चे मुझको चिढ़ाते है।

मेरा उपहास करते है, मुझको अपने साथ भी नहीं खिलाते, में अकेली रहती हूँ, तुम क्यों नहीं आते। 

क्या तुम मुझ से रूठ गए हो, जो एक बार भी घर नहीं आते, मैने तो तुम को कभी देखा भी नहीं।

अपनी बाल कल्पनाओं में खोई चंदा लड्डू गोपाल से अपने मन का सारा दुःख कह देती। 

चंदा का प्रेम निश्च्छल था,वह अपने भाई को पुकारती थी। 

उसके प्रेम के आगे भगवान भी नतमस्तक हो जाते थे, किन्तु उन्होंने कभी कोई उत्तर नहीं दिया।

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एक दिन चंदा ने अपनी दादी से  पूछा! दादी मेरे भाई घर क्यों नहीं आते, वह कहाँ रहते हैं। 

तब दादी  ने उसको टालने के उद्देश्य से कहा तेरा भाई जंगल में रहता है, एक दिन वह अवश्य आएगा। 

चंदा ने पूछा क्या उसको जंगल में डर नहीं लगता, वह जंगल में क्यों रहता है। 

तब दादी ने उत्तर दिया नहीं वह किसी से नहीं डरता, उसको गांव में अच्छा नहीं लगता इसलिए वह जंगल में रहता है।

धीर- धीरे रक्षा बंधन का दिन निकट आने लगा, गाँव में सभी लड़कियों ने अपने भाइयों के लिए राखियां खरीदी, वह चंदा को चिढ़ाने लगी कि तेरा तो कोई भाई नहीं तू किसको राखी बंधेगी।

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अब चंदा का सब्र टूट गया वह घर आकर जोर जोर से रोने लगी, दादी के पूंछने पर उसने सारी बात बताई, तब उसकी दादी भी बहुत दुःखी हुई उसने चंदा को प्यार से समझाया कि मेरी बच्ची तू रो मत, तेरा भाई अवश्य आएगा,किन्तु चंदा का रोना नहीं रुका वह लड्डू गोपाल की प्रतिमा के पास जाकर उससे लिपट कर जोर-जोर से रोने लगी और बोली की भाई तुम आते क्यों नहीं, सब भाई अपनी बहन से राखी बंधवाते हैं, फिर तुम क्यों नहीं आते।

उधर गोविन्द चंदा की समस्त चेष्टाओं के साक्षी बन रहे थे।  

रोते-रोते चंदा को याद आया कि दादी ने कहा था कि उसका भाई जंगल में रहता है, बस फिर क्या था वह दादी को बिना बताए नंगे पाँव ही जंगल की और दौड़ पड़ी, उसने मन में ठान लिया था कि वह आज अपने भाई को लेकर ही आएगी।

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जंगल की काँटों भरी राह पर वह मासूम दौड़ी जा रही थी,श्री गोविन्द उसके साक्षी बन रहे थे। 

तभी श्री हरी गोविन्द पीढ़ा से कराह उठे उनके पांव से रक्त बह निकला, आखिर हो भी क्यों ना श्री हरी का कोई भक्त पीढ़ा में हो और भगवान को पीड़ा ना हो यह कैसे संभव है, जंगल में नन्ही चंदा के पाँव में काँटा लगा तो भगवान भी पीढ़ा कराह  उठे। 

उधर चंदा के पैर में भी रक्त बह निकला वह वही बैठ कर रोने लगी, तभी भगवान ने अपने पाँव में उस  स्थान पर हाथ फैरा जहा कांटा लगा था, पलक झपकते है चंदा में पाँव से रक्त बहना बंद हो गया और दर्द भी ना रहा वह फिर से उठी और जंगल की और दौड़ चली।

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इस बार उसका पाँव काँटों से छलनी हो गया किन्तु वह नन्ही सी जान बिना चिंता किये दौड़ती रही उसको अपने भाई के पास जाना था अंततः एक स्थान पर थक कर रुक गई और रो-रो कर पुकारने लगी भाई तुम कहाँ हों, तुम आते क्यों नहीं।

अब श्री गोविन्द के लिए एक पल भी रुकना कठिन था, वह तुरंत उठे और एक ग्यारहा -बारहा वर्ष के सुन्दर से बालक का रूप धारण किया तथा पहुँच गए चंदा के पास। 

उधर चंदा थक कर बैठ गई थी और सर झुका कर रोये जा रही थी तभी उसके सर पर किसी के हाथ का स्पर्श हुआ। 

और एक आवाज सुनाई दी, में आ गया मेरी बहन, अब तू ना रो।

चंदा ने सर उठा कर उस बालक को देखा और पूंछा क्या तुम मेरे भाई हो ? 

तब उत्तर मिला "हाँ चंदा, में ही तुम्हारा भाई हूँ" यह सुनते ही चंदा अपने भाई से लिपट गई और फूट फूट कर रोने लगी।

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तभी भक्त और भगवान के मध्य भाव और भक्ति का एक अनूठा दृश्य उत्त्पन्न हुआ, भगवान वही धरती पर बैठ गए उन्होंने नन्ही चंदा के कोमल पैरो को अपने हाथो में लिया और उसको प्रेम से देखा।

वह छोटे-छोटे कोमल पांव पूर्ण रूप से काँटों से छलनी हो चुके थे उनमे से रक्त बह रहा था, यह देख कर भगवान की आँखों से आंसू बह निकले उन्होंने उन नन्हे पैरो को अपने माथे से लगाया और रो उठे,अद्भुद दृश्य,बहन भाई को पाने की प्रसन्नता में रो रही थी और भगवान अपने भक्त के कष्ट को देख कर रो रहे थे।  

श्री हरी ने अपने हाथो से चंदा के पैरो में चुभे एक एक कांटे को बड़े प्रेम से निकाला फिर उसके पैरो पर अपने  हाथ का स्पर्श किया, पलभर में सभी कष्ट दूर हो गया। 

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चंदा अपने भाई का हाथ पकड़ कर बोली भाई तुम घर चलो, कल रक्षा बंधन है, में भी रक्षा बंधन करुँगी। 

भगवान बोले अब तू घर जा दादी प्रतीक्षा कर रही होगी, में कल प्रातः घर अवश्य आऊंगा। 

ऐसा कहकर उसको विश्वाश दिलाया और जंगल के बाहर तक छोड़ने आए। 

अब चंदा बहुत प्रसन्न थी उसकी सारी चिंता मिट गई थी, घर पहुंची तो देखा कि दादी का रो रो कर बुरा हाल था चंदा को देखते ही उसको छाती से लगा लिया। 

चंदा बहुत पुलकित थी बोली दादी अब तू रो मत कल मेरा भाई आएगा, में भी रक्षा बंधन करुँगी। 

दादी ने अपने आंसू पोंछे उसने सोंचा कि जंगल में कोई बालक मिल गया होगा जिसको यह अपना भाई समझ रही है, चंदा ने दादी से जिद्द करी और एक सुन्दर सी राखी अपने भाई के लिए खरीदी।

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अगले दिन प्रातः ही वह नहा-धो कर अपने भाई की प्रतीक्षा में द्वार पर बैठ गई, उसको अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी थोड़ी देर में ही वह बालक सामने से आते दिखाई दिया, उसको देखते ही चंदा प्रसन्नता से चीख उठी  दादी भाई आ गया और वह दौड़ कर अपने भाई के पास पहुँच गई, उसका हाथ पकड़ कर घर में ले आई। 

अपनी टूटी-फूटी चारपाई पर बैठाया बड़े प्रेम से भाई का तिलक किया आरती उतारी और रक्षा बंधन किया। 

सुन्दर राखी देख कर भाई बहुत प्रसन्न था, भाई के रूप में भगवान उसके प्रेम को देख कर विभोर हो उठे थे, अब बारी उनकी थी। 

भाई ने अपने साथ लाए झोले को खोला तो खुशिओं का अम्बार था, सुन्दर, कपडे, मिठाई, खिलोने, और भी बहुत कुछ। 

चंदा को मानो पंख लग गए थे!उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था।

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कुछ समय साथ रहने के बाद वह बालक बोला अब मुझको जंगल में वापस जाना है।  

चंदा उदास हो गई, तब वह बोला तू उदास ना हो, आज से प्रतिदिन में तुमसे मिलने अवश्य आऊंगा। 

अब वह प्रसन्न थी। 

बालक जंगल लौट गया। 

उधर दादी असमंजस में थी कौन है यह बालक,उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। 

किन्तु हरी के मन की हरी ही जाने।

भाई के जाने के बाद जब चंदा घर में वापस लौटी तो एकदम ठिठक गई उसकी दृष्टि लड्डू गोपाल की प्रतीमा पर पड़ी तो उसने देखा कि उनके हाथ में वही राखी बंधी थी जो उसने अपने भाई के हाथ में बांधी थी।

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उसने दादी को तुरंत बुलाया यह देख कर दादी भी अचम्भित रह गई, किन्तु उसने बचपन से कृष्ण की भक्ति करी थी वह तुरंत जान गई कि वह बालक और कोई नहीं स्वयं श्री हरी ही थे, वह उनके चरणो में गिर पड़ी और बोली, है छलिया, जीवन भर तो छला जीवन का अंत आया तो अब भी छल कर चले गए।

वह चंदा से बोली अरी वह बालक और कोई नहीं तेरा यही भाई था।  

यह सुन कर चंदा भगवान की प्रतीमा से लिपट कर रोने लगी रो रो कर बोली कहो ना भाई क्या वह तुम ही थे, में जानती हूँ वह तुम ही थे, फिर सामने क्यों नहीं आते, छुपते क्यों हो।

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दादी पोती का निर्मल प्रेम ऐसा था कि भगवान भी विवश हो गए। 

लीला धारी तुरंत ही विग्रह से प्रकट हो गए और बोले हां चंदा में ही तुम्हारा वह भाई हूँ, तुमने मुझको पुकारा तो मुझको आना पड़ा। 

और में कैसे नहीं आता, जो भी लोग ढोंग, दिखावा, पाखंड रचते है उनसे में बहुत दूर रहता हूँ, किन्तु जब मेरा कोई सच्चा भक्त प्रेम भक्ति से मुझको पुकारता है तो मुझको आना ही पड़ता है।

भक्त और भगवान की प्रेममय लीला चल रही थी, और दादी वह तो भगवान में लीन हो चुकी थी रह गई, चंदा तो उस दिन के बाद से गाँव में उनको किसी ने नहीं देखा, कोई नहीं जान पाया की आखिर दादी-पोती कहा चले गए। 

प्रभु की लीला प्रभु ही जाने...  


      || भगवान लड्डू गोपाल की जय हो ||

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 || शिव तत्व विचार || 

वर्तमान समय का एक बहुत बड़ा दुर्भाग्य यह है कि बहुत सारे लोगों द्वारा भगवान शिव के नाम पर भाँग, गांजा जैसे अनेक प्रकार का नशा किया जाता है और भोले बाबा का प्रसाद कहकर दूसरों को भी कराया जाता है। 

हाँ भगवान शिव नशा अवश्य करते थे लेकिन केवल और केवल राम नाम का। 

महादेव तो आशुतोष भोलेनाथ हैं इस लिए भांग के पत्ते, जिन्हें पशु तक भी नहीं खाते और धतूरे का वह फल, जिसे कोई पक्षी तक चोंच नहीं मारते उनको अर्पित करने वाले का भी कल्याण कर देते हैं। 


भगवान भोलेनाथ के प्रसाद के नाम से प्रचलित इस नशा की कुप्रथा का सभी शिव भक्तों द्वारा पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए। 

नशा करने वाले का कभी भी कल्याण संभव ही नहीं, अब वह भले ही भोले बाबा अथवा देवी माँ के प्रसाद के नाम से ही क्यों न किया जाए। 

यदि तनिक भी कल्याण की चिंता हो तो शिव के नाम पर नशा नहीं अपितु शिव के नाम का नशा करो। 

अंत में सार केवल इतना कि भक्ति का नशा करो, नशे की भक्ति कदापि नहीं।


     🔱ॐ नमः शिवाय🔱

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!!!!! शुभमस्तु !!!


🙏हर हर महादेव हर...!!


जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏


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Sunday, December 7, 2025

मंदिर का निर्माण क्यों ?

मंदिर का निर्माण क्यों ?


व्यक्ति किसी भी देश, संप्रदाय या वर्ग का क्यों न हो, दुनिया के समस्त प्राणियों में सिर्फ मनुष्य ने ही मंदिर ( धर्म - स्थलों ) का निर्माण किया है। 





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भले ही अलग - अलग संप्रदाय के लोग अपने - अपने ढंग से, अलग - अलग तरह के मंदिर बनाकर उन्हें गुरुद्वारा, गिरजाघर ( चर्च ), मस्जिद आदि अलग - अलग नामों से पुकारते हों, किंतु इन्हें बनाने का उद्देश्य है कि इन्हें देखकर मनुष्य को परमात्मा का स्मरण हो, जहां पर परमात्मा की शरण प्राप्त करने का मार्ग मिले, जहां दुनियादारी के झंझटों को भूलकर एकाग्र और ध्यान - मग्न होकर मन को शांति मिले। 

उस पवित्र वातावरण में मन को निर्विकार कर प्रभु भक्ति में लीन किया जा सके।

वास्तव में देखा जाए तो मंदिर एक ऐसा स्थल होता है, जहां आध्यात्मिक और धार्मिक वातावरण होता है तथा देवपूजा उसका लक्ष्य होता है। 

यहां आप अकेले या अन्य व्यक्तियों की उपस्थिति में भी बैठकर शांत मन से जाप, पूजा - पाठ, आरती, भजन, मंत्र पाठ, ध्यान आदि कर सकते हैं। 

ऐसे धूप - दीप आदि सुगंधित द्रव्यों के कारण मंदिर के चारों ओर दिव्य शक्ति का संचार रहता है, 

जिसके कारण भूत-प्रेत और विषाणुयुक्त कीटाणुओं की शक्ति क्षीण होती है। 

माहौल में आपके मन की भाव - दशा प्रभु की भक्ति, पूजा, प्रार्थना उपासना के अनुकूल होती है, जिससे इन कर्म - कांडों को पूरा करने का आपको शारीरिक और मानसिक लाभ मिलता है। 
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अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। 

इस में कोई दो मत नहीं कि मंदिर जाने वालों में वास्तविक भक्त कम और याचक यानी भगवान से कुछ न कुछ मांगने वाले ज्यादा होते हैं। 

कुछ मन्नत मांगने के लिए मंदिर पहुंचते हैं तो कुछ मांगी हुई मन्नत पूरी होने पर अपना वायदा पूरा करने के लिए पहुंचते हैं। 

मतलब यह कि भगवान को भी मंदिर में रिश्वत का लालच देने का प्रचलन आम बन गया है। 

यदि हम कुछ मांगने के लिए ही मंदिर जाते हैं तो फिर हम मंदिर नहीं, किसी दुकान पर जाते हैं । 

जबकि वास्तविक, सच्चा भक्त भक्ति भाव, अहोभाव और प्रभु के प्रति तादात्म्य भाव लेकर ही मंदिर जाता है। 

एक बार, जगद्गुरु शंकराचार्य से नगर सेठ माणिक ने पूछा-"आचार्यवर! 

आप तो वेदांत के समर्थक हैं। 

भगवान् को निराकार सर्वव्यापी मानते हैं, फिर मंदिरों की प्रदर्शनात्मक मूर्तिपूजा परक प्रक्रिया का समर्थन क्यों करते हैं ?

" आचार्य बोले-" वत्स! उस दिव्य सर्वव्यापी चेतना का बोध सबको अनायास नहीं होता। 

मंदिरों में प्रात :- संध्या संधिकाल से, शंख - घंटों के नाद के साथ दूर - दूर तक उपासना के समय का बोध कराया जाता है। 

घर - घर उपासना के योग्य उपयुक्त स्थल नहीं मिलते, मंदिर के संस्कारित वातावरण में कोई भी 

जाकर उपासना कर सकता है। 

नैतिकता, सदाचार और श्रद्धा के दर्रों के रूप में देवालय अत्यंत उपयोगी हैं। 

जनसाधारण के लिए यह अत्यावश्यक है।"

मंदिर के ऊपर गुंबद का निर्माण क्यों ?

मंदिर के ऊपर गुंबद बनाना ध्वनि सिद्धांत और वास्तुकला की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है साधक देव प्रतिमाओं के सामने बैठकर पूजा - अर्चन में जो मंत्र जाप करते हैं, उनकी ध्वनि मंदिर के गुंबद से टकराकर घूमती है और ऊपर की ओर गुंबद के संकरे होते जाने के कारण केंद्रीभूत हो जाती है। 

गुंबद का सबसे ऊपर का मध्य भाग जहां कलश - त्रिशूल आदि लगा होता है। 

वह अत्यंत संकरा और बिंदु रूप होता है। 

यह स्थान इस प्रकार बनाया जाता है कि देव प्रतिमा का सहस्रार स्थान और गुंबद का विंदु स्थान एक रेखा में रहे।

मंत्र शाश्वत शब्द ब्रह्म है और उसमें सभी प्रकार की ईश्वरीय शक्ति समन्वित है। 

अतः गुंबद से टकराकर जब मंत्र ध्वनि देवता के सहस्रार से टकराती है, तो देव प्रतिमाएं जाग्रत हो जाती हैं और साधक को उसकी भावना के अनुसार फल प्रदान करती हैं।

जिस प्रकार का मंत्र बोला जाता है, वह देव प्रतिमा को उसी रूप में जाग्रत करता है अतः देव प्रतिमा से मिलने वाला फल मंत्र की भावना के अनुकूल ही होता है। 

ऐसे स्थल निरंतर पूजा - साधना से सिद्ध स्थल हो जाते हैं और वहां जाकर साधना करने पर तुरंत फल मिलता है। 
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इस लिए ये बहुत प्रसिद्ध भी हो जाते हैं। 

गुंबद एक अर्थ में हमारे ऋषि - मुनियों द्वारा खोजे गए पिरामिड संबंधी ज्ञान के प्रतिरूप हैं। 

पिरामिड सिद्धांत के गुंबद के रूप में एक ऐसे शक्ति क्षेत्र का निर्माण किया जाता है जहां रखी वस्तुएं बहुत काल तक पृथ्वी के बाह्य प्रभाव से मुक्त होकर सुरक्षित रही आती हैं। 

मिश्र के पिरामिडों में हजारों वर्ष से रखी मृत देह और अन्य वस्तुओं का आज भी सुरक्षित मिलना तथा एक विशेष प्रकार की चुंबकीय शक्ति का वहां मिलना इन्हीं तथ्यों को प्रकट करता है। 

इस रूप में मंदिर के गुंबदों का संबंध देव - प्रतिमाओं, साधकों और उनकी भावनाओं की सुरक्षा एवं पूर्ति से स्पष्ट प्रतीत होता है।





|| करुणा ||


करुणा का अर्थ है दूसरों के दुख को समझना और उस दुख को दूर करने के लिए मदद करने की तीव्र इच्छा होना। 

यह केवल सहानुभूति या दया से बढ़कर है, क्योंकि यह सक्रिय रूप से दूसरों की पीड़ा को कम करने के लिए प्रेरित करती है। 

यह एक ऐसी भावना है जो प्रेम, दया, अहिंसा और शांति जैसे गुणों को सशक्त बनाती है।

करुणा केवल भावना नहीं,यह आत्मा की मूल गंध, उसका प्राकृतिक प्रकाश है।

जहाँ करुणा है, वहाँ अहंकार नहीं;जहाँ करुणा है, वहाँ हिंसा नहीं;और जहाँ करुणा है, वहीं ईश्वर का निवास है।
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करुणा हमें दूसरों की पीड़ा महसूस कराती है,पर उससे भी गहरा यह है कि करुणा हमें हमारी अपनी आत्मा से जोड़ती है। 

एक करुणामय व्यक्ति जहाँ जाता है,वहाँ शांति फैलती है, संतोष लता है,और लोगों के हृदय हल्के हो जाते हैं।

करुणा के तीन रूप :- विचारों में करुणा, किसी के लिए बुरा न सोचना वाणी में करुणा, किसी को चोट पहुँचाए बिना बोलना कर्म में करुणा,बिना अपेक्षा सहायता करना।

करुणा वह शक्ति है - जो कठोर से कठोर हृदय को भी पिघला देती है।

यह संघर्ष नहीं मिटाती,यह संघर्ष को साधना में बदल देती है।

उपनिषद् करुणा को धर्म का हृदय बताते हैं-
दया धर्म का मूलम्।ये धर्मों का आधार है।

       || महाकाल ||
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|| किशोरी जी की अद्भूत कृपा ||


बरसाना में चेतन्य महाप्रभु के छःशिष्यों में से एक हैं जीव गोस्वामी। 

एक बार श्री रूप गोस्वामी भ्रमण करते - करते अपने चेले,जीव गोस्वामीजी के यहाँ बरसाना आए। 

जीव गोस्वामीजी ठहरे फक्कड़ साधू | 

फक्कड़ साधू को जो मिल जाये वो ही खाले, जो मिल जाये वो ही पी ले।

आज उनके गुरु आए तो उनके मन में भाव आया कि मैं तो रोज सूखी रोटी, पानी में भिगोकर खा लेता हूं। 

मेरे गुरु आये हैं क्या खिलाऊँ ?

एक बार अपनी कुटिया में देखा तो किंचित तीन दिन पुरानी रोटी जो बिल्कुल कठोर हो चुकी रखी थी। 
मैं साधू पानी में गला - गलाकर खा लूं।

यद्यपि मेरे गुरु साधुता की परम स्थिति को प्राप्त कर चुके हैं फिर भी मेरे मन के आनन्द के लिए कैसे मेरा मन संतुष्ट होगा? 

एक क्षण के भक्त के मन में संकल्प आया कि अगर समय होता तो किसी बृजवासी के घर चला जाता। 
दूध मांग लाता, चावल मांग लाता। 

मेरे गुरु पधारे जो देह के सम्बंध में मेरे चाचा भी लगते हैं। 

लेकिन भाव साम्रज्य में प्रवेश कराने वाले मेरे गुरु भी तो हैं। उनको खीर खिला देता।

रूप गोस्वामीने आकर कहा जीव भूख लगी है तो जीव गोस्वामी उन सूखी रोटीयो को अपने गुरु को दे रहा है। 

अँधेरा हो रहा है। 

जीव गोस्वामी की आँखोंमें अश्रु आ रहे हैं और रुप गोस्वामीजी ने कहा तू क्यों रो रहा है |

हम तो साधू हैं ना, जो मिल जाय वही खा लेते हैं। 

नहीं - नहीं मैं खा लूंगा। 

जीव ने कहा, नहीं बाबा! 

मेरा मन नहीं मान रहा। 

आपकी यदि कोई पूर्व सूचना होती तो मेरे मन में कुछ था। 

यह चर्चा हो ही रही थी कि कोई अर्द्धरात्रि में दरवाजा खटखटाता है। 

ज्यो ही दरवाजा खटखटाया तो जीव गोस्वामीजी ने दरवाजा खोला। 

एक किशोरी खड़ी हुई है 8 -10 वर्ष की हाथ में कटोरा है। 

कहा, बाबा! 

मेरी माँने खीर बनाई है और कहा है  जाओ बाबा को दे आओ। 

जीव गोस्वामी ने उस खीर के कटोरे को ले जाकर रुप गोस्वामीजी के पास रख दिया। 

बोले बाबा पाओ।

ज्यों ही रूप गोस्वामीजीने उस खीर को स्पर्श किया उनका हाथ कांपने लगा।
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जीव गोस्वामीको लगा बाबा का हाथ कांप रहा है। 

पूछा बाबा! 

क्या कोई अपराध बन गया है। 

रूप गोस्वामी जी ने पूछा, जीव! आधी रात को यह खीर कौन लाया ?

बाबा पड़ोस में एक कन्या है मैं जानता हूं उसे। 

वो लेके आई है। 

नहीं जीव इस खीर को मैने जैसे ही चखके देखा और मेरे में ऐसे रोमांच हो गया।

नहीं जीव! 

तू पता कर यह कन्या मुझे मेरे किशोरीजी के होने का अहसास दिला रही है। 

नहीं बाबा ! 

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वह कन्या पास की है, मैं जानता हूं उसको।

अर्ध रात्रिमें दोनों उसके घर गये और दरवाजा खटखटाया। 

अंदर से उस कन्या की माँ निकलकर बाहर आई। 

जीव गोस्वामीजी ने पूछा आपको कष्ट दिया, परन्तु आपकी लड़की कहां है।

उस महिला ने कहा, का बात हो गई बाबा ? 

आपकी लड़की है कहाँ ? 

वो तो उसके ननिहाल गई है गोवेर्धन, 15 दिन हो गए हैं। 

रूप गोस्वामीजी तो मूर्छित हो गए।

जीव गोस्वामीजी ने पैर पकडे और जैसे - तैसे श्रीजी के मंदिर की सीढ़िया चढ़ने लगे। 

जैसे एक क्षणमें ही चढ़ जायें। 

लंबे - लंबे पग भरते हुए मंदिर पहुचे। 

वहां श्री गोसाईजी से पूछा, बाबा! 

एक बात बताओ आज क्या भोग लगाया था श्रीजी श्यामा प्यारी को। 

श्रीजीव गोस्वामी को गोसांईजी जानते थे। 

श्री गोसाईंजी ने कहा क्या बात है बाबा...? 

श्रीजीव ने कहा क्या भोग लगाया था ? 

गोसाईजी ने कहा, आज श्रीजी को खीर का भोग लगाया था।

रूप गोस्वामी तो श्रीराधे श्रीराधे कहने लगे। 

उन्होंने गोसाईजी से कहा बाबा! 

एक निवेदन और है आपसे। 

यद्दपि यह मंदिर की परंपरा के विरुद्ध है कि एक बार जब श्रीजी को शयन करा दिया जाये तो उनकी लीला में जाना अपराध है। 

{ प्रिया प्रियतम जब विराज रहे हों तो नित्य लीला है उनकी।

अपराध है फिर भी आप एक बार यह बता दीजिये कि जिस पात्रमें भोग लगाया था वह पात्र रखो है के नहीं रखो है। }

गोसाईजी मंदिर के पट खोलते हैं और देखते हैं कि वह पात्र नहीं है वहां पर। 

गोसांईजी बाहर आते हैं और कहते हैं बाबा वह पात्र नहीं है वहां पर! न जाने का बात है गई है...?

रूप गोस्वामीजीने अपना दुप्पटा हटाया और वह चाँदी का पात्र दिखाया, बाबा! यह पात्र तो नहीं है | 

गोसांईजी ने कहा हां बाबा यही पात्र तो है।

रूप गोस्वामीजी ने कहा, श्रीराधा रानी 300 सीढ़ी उतरकर मुझे खीर खिलाने आई। 

किशोरी पधारी थी, राधारानी आई थी। 

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उस खीर को मुख पर रगड़ लिया सब साधु संतो को बांटते हुए श्रीराधे श्रीराधे करते हुऐ फिर कई वर्षो तक श्री रूप गोस्वामीजी बरसाना में ही रहे। 

हे करुणा निधान! इस अधम, पतित - दास को ऐसी पात्रता और ऐसी उत्कंठा अवश्य दे देना कि इन रसिकों के गहन चरित का आस्वादन कर अपने को कृतार्थ कर सकूँ। 

इनकी पद धूलि की एक कनिका प्राप्त कर सकूँ।

              || जय श्री राधे राधे  ||

!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -
श्री सरस्वति ज्योतिष कार्यालय
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Satvara vidhyarthi bhuvn,
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

Friday, December 5, 2025

मार्गशीर्ष मास अनंत व्रत :

मार्गशीर्ष मास अनंत व्रत :

अनंत व्रत से श्रेष्ठ संतान के साथ प्राप्त होता है ऐश्वर्य,कथा और विधि हिंदू धर्म में अनंत व्रत का मार्गशीर्ष मास से शुरू होने वाला व्रत है....! 

पौराणिक मान्यता के अनुसार इस व्रत से व्रतकर्ता को संतान व एैश्वर्य की प्राप्ति होती है....! 


इस व्रत में बारह महीनों में नक्षत्र के हिसाब से भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है।

संतान सुख व ऐश्वर्य पाने के लिए हिंदू धर्म में अनंत व्रत का विधान है....! 

मार्गशीर्ष मास में शुरू होने वाले इस व्रत में भगवान विष्णु की बारह मास की पूजा की जाती है....! 


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पौराणिक मान्यता के अनुसार जो भी सन्तानहीन स्त्री - पुरुष इस व्रत को करते हैं...! 

उन्हें नीरोगी, दीर्घायु, बलवान, धर्मज्ञ, भाग्यवान और सभी गुणों से संपन्न संतान की प्राप्ति होती है।

अनंत व्रत की कथा :


प्राचीन समय में हैहयवंश में महिष्मति नगरी में कृत्यवीर्य नाम के राजा की शीलधना नाम की एक रानी थी....! 


जिसने संतान प्राप्ति के लिए ब्रह्मावादिनी मैत्रयी से उपाय पूछा था...! 

इस पर मैत्रेयी ने उसे अनंत व्रत की विधि बताई....! 

जिसे विधिपूर्वक करने पर शीलधना को कार्तवीर्यार्जुन नाम का ओजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ....! 

जिसने भगवान विष्णु के अवतार श्री दत्तात्रेय की आराधना कर चक्रवर्ती सम्राट बनने का वर प्राप्त कर देवताओं की तरह पूजनीय स्थान प्राप्त किया था।
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अनंत व्रत की विधि :


भविष्यपुराण के अनुसार मैत्रेयी के बताये अनुसार अनंत व्रत की विधि भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को भी बताई थी....! 

जिसके अनुसार मार्गशीर्ष मास में जिस दिन मृगशिरा नक्षत्र हो उस दिन व्रत शुरू करना चाहिए....! 

इस वर्ष यह व्रत मार्गशीर्ष मास मे 29 नवम्बर एवं 26 दिसंबर से आरम्भ करना चाहिये। 

इस दिन स्नान कर गंध, पुष्प, धूप, दीप आदि से अनंत भगवान के बाएं चरण का पूजन कर ब्राह्मण को दक्षिणा देनी चाहिए. रात के समय तेल रहित भोजन करना चाहिए....! 

इसी विधि से पौष मास में पुष्य नक्षत्र में भगवान के बाएं कटी प्रदेश, माघ मास में मघा नक्षत्र में भगवान की बाईं भुजा और फाल्गुन मास में फाल्गुनी नक्षत्र में बायें कंधे का पूजन करें....! 

इन 4 महीनों में व्रती गोमूत्र का सेवन कर ब्राह्मण को तिल का दान करें।
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चैत्र से कार्तिक तक यूं करें पूजन :


भविष्य पुराण के अनुसार चैत्र मास में चित्रा नक्षत्र में भगवान के दाहिने कंधे, वैशाख में विशाखा नक्षत्र में दाहिनी भुजा, ज्येष्ठ में ज्येष्ठा नक्षत्र में दाहिने कटी प्रदेश और आषाढ़ में आषाढ़ा नक्षत्र में दाहिने पैर का पूजन करें....! 

इन 4 महीनों में पंचगव्य का सेवन कर व्रती को रात को भोजन  कर ब्राह्मण को दान देना चाहिए....! 

श्रावण मास में श्रवण नक्षत्र में भगवान विष्णु के दोनों चरणों, भाद्रपद में उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में गुह्या स्थान, अश्विन मास में अश्विनी नक्षत्र में ह्रदय और कार्तिक मास में कृतिका नक्षत्र में भगवान के सिर का पूजन करना चाहिए...! 

इन 4 महीनों में व्रतकर्ता को घी का सेवन कर ब्राह्मण को दान देना चाहिए।
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हर महीने हवन, चार महीने से पारणा :


भविष्य पुराण के अनुसार इस व्रत में भगवान विष्णु के व्रत के साथ हवन का विधान भी है....! 

मार्गशीर्ष से फाल्गुन मास तक पहले चार महीनों में घी, चैत्र से आषाढ़ मास तक शालिधान्य तथा श्रावण से कार्तिक मास तक दूध से भगवान विष्णु का हवन करना चाहिए....! 

इस तरह 12 महीनों में तीन पारणा कर वर्ष के अंत में अनंत भगवान की मूर्ति और चांदी के हल व मूसल बनाएं....! 

बाद में मूर्ति को ताम्र पीठ पर स्थापित कर दोनों हल व मूसल रखकर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपचारों से पूजन करें....! 

बाद में चंद्रमा की पूजा कर सारी सामग्री ब्राह्मण को प्रदान करने पर व्रत पूर्ण होता है।



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🌿अपने जीवन के श्रीराम बनें🌿 


समस्या क्या है..? 


आज लाखों लोग जी रहे हैं - पर जीवन को जी नहीं रहे। 

हर दिन वही भागदौड़, वही थकान, वही आदतें, वही बातें — 

और मन के भीतर एक धीमी फुसफुसाहट:

“क्या यही मेरा जीवन है? 

क्या मैं इससे ज़्यादा नहीं बन सकता.?”

हम दूसरों की अपेक्षाओं में उलझकर अपने ही जीवन के डिज़ाइनर बनना भूल जाते हैं। 

जीवन बहता जाता है और हम बस बहते जाते हैं।

समाधान क्या है..? 

रामायण हमें सिखाती है कि जीवन संयोग से नहीं, संकल्प से बनता है। 

जैसे श्रीराम ने अपना हर कदम धर्म, उद्देश्य और स्पष्टता के साथ रखा...!

वैसे ही हम भी अपना भविष्य गढ़ सकते हैं।

रामायणजी बताती हैं कि आप अपने जीवन के वास्तुकार कैसे बनेंगे-: 

1. स्पष्ट दृष्टि — आपका आदर्श जीवन कैसा दिखता है?

जिस तरह राम वनवास में भी अपना धैर्य और मर्यादा नहीं भूले...!,

वैसे ही पहले यह तय करें — आप किस तरह का जीवन जीना चाहते हैं?

किस तरह के व्यक्ति बनना चाहते हैं? 

दृष्टि के बिना दिशा नहीं मिलती।

2. अपने मूल मूल्य तय करें।

राम के मूल्य स्पष्ट थे — सत्य, करुणा, कर्तव्य।

सीता के मूल्य स्पष्ट थे — धैर्य, प्रेम, त्याग।

लक्ष्मण के मूल्य स्पष्ट थे — निष्ठा, सेवा, समर्पण।

जब आपके मूल्य स्पष्ट होते हैं, तो निर्णय आसान हो जाते हैं।

3. दीर्घकालीन लक्ष्य — जो आपकी दृष्टि से मेल खाएँ।

महान कार्य एक दिन में नहीं होते।

हनुमान जी ने भी समुद्र-लांघन आकस्मिक नहीं किया —

वह उनके भीतर के वर्षों के अभ्यास, चरित्र और विश्वास का परिणाम था।      

छोटे - छोटे कदम जोड़कर ही महान यात्राएँ बनती हैं।

4. अपने सपनों को छोटे - छोटे कार्यों में बदलें।
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राम ने लंका पर विजय एक ही दिन में नहीं पाई। 

पहले सेतु बना, फिर योजना बनी, फिर युद्ध हुआ। 

“बड़ा सपना — छोटे कदम — बड़ी जीत”

5. अपने जीवन से ऊर्जा - चूसने वाली चीज़ें हटाएँ।

कुंभकरण की तरह कुछ लोग, कुछ आदतें, कुछ विचार हमारी ऊर्जा खा जाते हैं।

सीता जी का अशोक वाटिका में दुख — रावण या लंका नहीं था — वह अकेलापन और नकारात्मक वातावरण था। 
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अपने जीवन में उन सबको पहचानें जो आपकी रोशनी को मंद करते हैं।

6. अपना मानसिक ढांचा उन्नत करें।

हनुमान जी अपनी शक्ति भूल गए थे और जाम्बवंत ने उन्हें याद दिलाया -

“तुममें जितनी शक्ति है, तुम कल्पना भी नहीं कर सकते।”

अपने मन को रोज़ यह याद दिलाना सीखें—

मैं सीख सकता हूँ। 

मैं बेहतर बन सकता हूँ। 

मैं अपने जीवन को बदल सकता हूँ।

7. ऐसी दिनचर्या बनाएँ जो हमको अपने सपनों के व्यक्तित्व में ढाले।

हम भविष्य से नहीं बदलते, हम आदतों से बदलते हैं।

लक्ष्मणजी की तपस्या, हनुमानजी की निष्ठा, सीताजी का धैर्य, रामजी का अनुशासन — सब आदतें थीं, चमत्कार नहीं।

8. अपने आसपास प्रेरक लोग रखें...!

हमारा वातावरण हमारा भविष्य तय करता है।

राम के पास लक्ष्मण थे, हनुमान थे, विभीषण जैसे मार्गदर्शक थे।

गलत संगत ग़लत दिशा की और ले जाती है।

सही संगत सही उन्नति की और ले जाती है ।

9. लचीले रहें — जीवन बदलता है, हम भी बदलें।

रामायण हमें सिखाती है — परिस्थितियाँ बदलें, मार्ग बदलें, पर मूल्य और उद्देश्य नहीं बदलते।

हमारी योजना कठोर नहीं होनी चाहिए, हमारा संकल्प होना चाहिए।

10. हर महीने अपने जीवन की समीक्षा करें।

राम ने भी अपने हर निर्णय पर विचार किया—

चाहे वह वनवास हो, या सीता की अग्नि परीक्षा, या लंका का अभियान।

जीवन में आगे बढ़ने का एक ही तरीका है — समीक्षा, सुधार और पुनर्संकल्प।

अपने जीवन के श्रीराम बनें। हम यह जीवन एक ही बार जीते हैं।

इसे बहने न दें — इसे बनाएं।
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हमारे निर्णय, हमारी आदतें, हमारी संगत, हमारा दृष्टिकोण और हमारा साहस — यही मिलकर वह जीवन बनाते हैं, जिसे जीकर हम गर्व महसूस करते हैं।

रामायणजी कहती हैं कि जीवन को संयोग पर मत छोड़ो, स्वयं उसका निर्माता बनो।

🙏🏼🌺 || श्रीकृष्ण ||🌺🙏🏼




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|| मीरा चरित ||


क्रमशः से आगे .........!

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का समय है । 


मीरा श्याम कुन्ज में ठाकुर के आने की प्रतीक्षा में गायन कर रही है ।


उसे लीला अनुभूति हुई कि वह गोप सखा वेश में आँखों पर पट्टी बाँधे श्यामसुन्दर को ढूँढ रही है ।

तभी गढ़ पर से तोप छूटी । 

चारभुजानाथ के मन्दिर के नगारे , शंख , शहनाई एक साथ बज उठे ।

समवेत स्वरों में उठती जय ध्वनि ने दिशाओं को गुँजा दिया - 

" चारभुजानाथ की जय ! गिरिधरण लाल की जय ।"

उसी समय मीरा ने देखा - जैसे सूर्य चन्द्र भूमि पर उतर आये हो , उस महाप्रकाश के मध्य शांत स्निग्ध ज्योति स्वरूप मोर मुकुट पीताम्बर धारण किए सौन्दर्य - सुषमा सागर श्याम सुन्दर खड़े मुस्कुरा रहे हैं ।
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वे आकर्ण दीर्घ दृग ,उनकी वह ह्रदय को मथ देने वाली दृष्टि , वे कोमल अरूण अधर - पल्लव , बीच में तनिक उठी हुई सुघड़ नासिका , वह स्पृहा - केन्द्र विशाल वक्ष , पीन प्रलम्ब भुजायें ,कर - पल्लव , बिजली सा कौंधता पीताम्बर और नूपुर मण्डित चारू चरण । 

एक दृष्टि में जो देखा जा सका.......! 

फिर तो दृष्टि तीखी धार -कटार से उन नेत्रों में उलझ कर रह गई । 

क्या हुआ ? 

क्या देखा ? 

कितना समय लगा ? 

कौन जाने ? 

समय तो बेचारा प्रभु और उनके प्रेमियों के मिलन के समय प्राण लेकर भाग छूटता है ।

"इतनी व्याकुलता क्यों , क्या मैं तुमसे कहीं दूर था ?" 

श्यामसुन्दर ने स्नेहासिक्त स्वर में पूछा ।

मीरा प्रातःकाल तक उसी लीला अनुभूति में ही मूर्छित रही ।

सबह मूर्छा टूटने पर उसने देखा कि सखियाँ उसे घेर करके कीर्तन कर रही है । 

उसने तानपुरा उठाया ।सखियाँ उसे सचेत हुई जानकार प्रसन्न हुई ।

कीर्तन बन्द करके वे मीरा का भजन सुनने लगी ....!

+++ +++

🌿 म्हाँरा ओलगिया घर आया जी ।
तन की ताप मिटी सुख पाया , 
हिलमिल मंगल गाया जी ॥

🌿 घन की धुनि सुनि मोर मगन भया,
यूँ मेरे आनन्द छाया जी ।
मगन भई मिल प्रभु अपणा सूँ , 
भौं का दरद मिटाया जी ॥

🌿 चंद को निरख कुमुदणि फूलै ,
हरिख भई मेरी काया जी ।
रगरग सीतल भई मेरी सजनी ,
हरि मेरे महल सिधाया जी ॥

🌿 सब भक्तन का कारज कीन्हा ,
सोई प्रभु मैं पाया जी ।
मीरा बिरहणि सीतल भई ,
दुख द्वदं दूर नसाया जी ॥
म्हाँरा ओलगिया घर आयाजी ॥🌿

इस प्रकार आनन्द ही आनन्द में अरूणोदय हो गया । 

दासियाँ उठकर उसे नित्यकर्म के लिए ले चली ।

_क्रमशः ..................!